एक समय था, जब रोजगार का मतलब था-सरकारी नौकरी, प्राइवेट कंपनी की नौकरी, अपनी छोटी-मोटी दुकान या व्यापार। माता-पिता अपने बच्चों से कहते थे, ‘बेटा, पढ़-लिखकर कोई अच्छी नौकरी कर लेना।’ आज वही माता-पिता अपने बच्चों से कहते हैं, ‘बेटा, तुम्हारा यूट्यूब चैनल कैसा चल रहा है?’ जहां एक ओर उच्च शिक्षण संस्थानों के 2.43 लाख छात्रों पर पीटीआई-भाषा द्वारा कराए गए सर्वे में नौ फीसदी छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकार की है, वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी से उपजे नैराश्य के बीच रोजगार की बदलती तस्वीर युवाओं के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है। यह बदलाव न केवल रोजगार पाने के तौर-तरीकों को बदल रहा है, बल्कि देश की रोजगार-संस्कृति को भी नई दिशा दे रहा है। और, इस बदलाव के केंद्र में है-यूट्यूब।
आज यूट्यूब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, भारत का सबसे बड़ा, सबसे लोकतांत्रिक और सबसे विकेंद्रीकृत रोजगार प्रदाता बन चुका है। एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, यूट्यूब ने भारत में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 9.6 लाख रोजगार पैदा किए हैं। 2025 में यूट्यूब का देश की जीडीपी में योगदान 18,000 करोड़ रुपये रहा है। आज देश के 73 फीसदी क्रिएटर्स के लिए यूट्यूब कमाई का मुख्य जरिया बन गया है।
आखिर भारत यूट्यूब का सबसे बड़ा बाजार और सबसे बड़ा कार्यस्थल क्यों है? दरअसल, दुनिया में यूट्यूब के सबसे ज्यादा यूजर्स भारत में हैं। लेकिन, हम केवल दर्शक नहीं, निर्माता भी हैं। भोजपुरी में खेती सिखाने वाला किसान, छत्तीसगढ़ी में गोंडी गीत गाने वाला आदिवासी युवक, कोटा में फिजिक्स पढ़ाने वाला शिक्षक, इंदौर में साड़ी बेचने वाली महिला-सभी आज यूट्यूब पर उद्यमी हैं। आज रोजगार आपके गांव, आपकी बोली और आपके हुनर में है। यूट्यूब की रोजगार अर्थव्यवस्था सिर्फ वीडियो बनाने वाले तक सीमित नहीं है। 9.6 लाख रोजगार का मतलब समझिए।
एक सफल यूट्यूबर के साथ पांच से दस लोगों की टीम जुड़ी होती है-वीडियो एडिटर, स्क्रिप्ट राइटर, थंबनेल डिजाइनर, कैमरामैन, सोशल मीडिया मैनेजर आदि। मेरे अपने विश्वविद्यालय के कई छात्र आज किसी बड़े यूट्यूब चैनल के लिए बतौर एडिटर 40-50 हजार रुपये महीना कमा रहे हैं। यह एक नया इको-सिस्टम है। एक क्रिएटर दस लोगों को रोजगार देता है। यह है रोजगार का गुणक प्रभाव। सरकार एक नौकरी देती है, जबकि यूट्यूब एक व्यक्ति को 10 नौकरियां पैदा करने की क्षमता देता है। यहां आपकी जाति, डिग्री, अंग्रेजी या शहर नहीं पूछा जाता। यहां सिर्फ एक सवाल है-‘आपके पास लोगों को देने के लिए क्या उपयोगी है?’ यही कारण है कि टियर-2, टियर-3 शहरों और आदिवासी अंचलों से इतने क्रिएटर्स निकल रहे हैं।
यह सामाजिक न्याय का भी एक नया मॉडल है। यूट्यूब के सीईओ नील मोहन ने पिछले वर्ष मई में भारतीय क्रिएटर इकनॉमी को नई रफ्तार देने के लिए अगले दो वर्षों में 850 करोड़ रुपये के बड़े निवेश का ऐलान किया था। यह निवेश केवल सर्वर या ऑफिस में नहीं लगेगा। यह निवेश क्रिएटर लर्निंग प्रोग्राम, एआई डबिंग टूल्स, जिससे एक छत्तीसगढ़ी वीडियो तमिल और तेलुगू में भी देखा जा सके, मोनेटाइजेशन सपोर्ट और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रोत्साहन में लगेगा। 850 करोड़ रुपये का आंकड़ा बताता है कि यूट्यूब के लिए भारत सिर्फ बाजार नहीं, भविष्य है। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले दो वर्षों में 9.6 लाख का आंकड़ा 15 लाख को पार कर जाएगा।
एक व्यावसायिक विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में मेरी चिंता है कि क्या हम इस बदलाव के लिए तैयार हैं? हमें तीन काम तुरंत करने होंगे। पहला, अब ‘क्रिएटर आंत्रप्रेन्योर’ भी एक विषय होना चाहिए। हम ‘क्रिएटर इकनॉमी और मोनेटाइजेशन’ सर्टिफिकेट कोर्स पर गहराई से मंथन कर सकते हैं। दूसरा, भाषा को रोजगार से जोड़ें। नील मोहन का एआई डबिंग का विजन क्रांतिकारी है। अगर छात्र अपनी बोली में कंटेंट बनाकर उसे एआई से 10 भाषाओं में डब कर सकें, तो उनकी कमाई 10 गुना बढ़ जाएगी। तीसरा, नैतिकता सिखाई जाए। 73 फीसदी लोगों के लिए यह मुख्य कमाई है। इसलिए यह जिम्मेदारी भी सीखनी चाहिए कि व्यूज के लिए फेक न्यूज या भ्रामक जानकारी देना बंद हो। सरकारें हर साल रोजगार मेले लगाती हैं। पर, यूट्यूब हर दिन, हर घंटे रोजगार मेला लगा रहा है। वह भी बिना किसी फॉर्म के और बिना किसी सिफारिश के।