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पुस्तक-प्रसंग: स्वतंत्रता के भारतीय विचार, युवाओं को अवश्य पढ़नी चाहिए अमेरिकी लेखक की यह किताब

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 13 Aug 2023 07:26 AM IST

सार

इंडियन आइडियाज ऑफ फ्रीडम  पुस्तक बेशक अमेरिकी विद्वान द्वारा लिखी गई है, लेकिन भारत को जानने और सीखने के इच्छुक युवाओं को अगर स्वतंत्रता के सही मायने समझने हैं, तो इसे जरूर पढ़ना चाहिए।
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Dennis Dalton - फोटो : सोशल मीडिया


तीसरी बात यह कि एक राजनीति विज्ञानी होने के बावजूद, उनका अपने दूसरे शैक्षिक सहयोगियों के उलट अपने विषय को लेकर एक गहरा ऐतिहासिक नजरिया रहता था। डेनिस डाल्टन ने जिंदगी भर गांधी पर जो शोध और लेखन किए थे, वे सभी उन्होंने 1993 में अपनी किताब महात्मा गांधी : नॉन वायलेंट पावर इन ऐक्शन में एकसाथ पिरो  दिए। प्रकाशन के कुछ समय बाद मैंने यह किताब पढ़ी और उसके बाद कई बार मैं इसके पन्ने पलट चुका हूं। महात्मा गांधी और उनकी विरासत पर लिखी यह मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में से है।


गांधी पर डाल्टन को पढ़ने के कई साल बाद मुझे उनकी एक दूसरी पुरानी किताब के बारे में पता चला, जो उन्होंने एक नहीं, बल्कि चार विचारकों की चौकड़ी पर लिखी थी। किताब का नाम है इंडियन आइडिया ऑफ फ्रीडम, जो 1982 में प्रकाशित हुई थी। अब चार दशक बाद इस किताब का विस्तारित संस्करण फिर से प्रकाशित हो रहा है। मूल किताब के पहले आठ अध्यायों के साथ इसमें डाल्टन का एक लंबा व्यक्तिगत संस्मरण प्रस्तावना के रूप में जोड़ा गया है। इसमें डाल्टन पूरी संवदेना के साथ भारत और भारतीय विचारकों के साथ अपने जीवन पर्यंत जुड़ाव को बयान करते हैं। इसमें तीन शानदार शख्सियतों पर आधारित तीन नए अध्याय भी जोड़े गए हैं, जो पहले संस्करण में नहीं थे। ये तीन शख्सियतें हैं, बीआर आंबेडकर, एमएन रॉय और जयप्रकाश नारायण। इन तीन विचारकों को जोड़ने से किताब के नाम में एक छोटा- सा बदलाव अनिवार्य हो गया था। किताब का अब नाम है, इंडियन आइडियाज ऑफ फ्रीडम।


डेनिस डाल्टन ने मूल रूप से जिन चार विचारकों पर ध्यान केंद्रित किया था, उनमें विवेकानंद, अरविंद, गांधी और टैगोर शामिल थे। इनमें से पहले एक  आध्यात्मिक गुरु, दूसरे एक क्रांतिकारी थे, जो बाद में रहस्यवादी बन गए, तीसरे एक राजनेता व सामाजिक सुधारक और चौथे एक कवि थे। इनमें से कोई भी उस तरह से राजनीतिक-सिद्धांतकार नहीं था, जैसे कि पश्चिमी शिक्षाविद इस श्रेणी को पारिभाषित करते हैं। कहने का आशय है कि इन विचारकों की पेशेवर और निजी राहें हॉब्स, लॉक, कांट और मिल जैसे यूरोपीय विचारकों से अलग थीं। बावजूद इसके, भारतीय राजनीतिक विचारों में विवेकानंद, अरविंद, गांधी और टैगोर का योगदान किसी से भी कम नहीं था।


यह किताब इस बुनियादी विचार पर आधारित है कि स्वतंत्रता के भारतीय विचारों की जड़ें स्वदेशी परंपराओं खासकर धार्मिक विचारों में ढूंढी जा सकती हैं। डाल्टन का तर्क है कि इन सभी विचारकों ने स्वतंत्रता की अपनी तलाश को व्यक्तिगत और राजनीतिक, दोनों रूपों में देखा। उनका मानना है कि आध्यात्मिक स्वतंत्रता की गहरी व्यक्तिगत चाह अनिवार्य रूप से पूरे समाज में होने वाले बदलावों से जुड़ी होती है। इन विचारकों ने सार्वजनिक जीवन में, साध्य व साधन के संबंध में नैतिकता बरतने को लेकर सतर्क रहने की बात कही। शायद यही वजह है कि इनमें से कई विचारकों का जोर अहिंसा पर रहा था।


इस पुस्तक में जिन विचारकों के बारे में बताया गया है, उन्हें सबसे अच्छी तरह से 'क्रिटिकल परंपरावादी' (आशीष नंदी द्वारा प्रयुक्त शब्द) के तौर पर व्यक्त किया जा सकता है। डाल्टन लिखते हैं कि भारतीय परंपराओं में कई ऐसे तत्व थे, जिन्हें विवेकानंद ने जोरदार ढंग से अस्वीकार किया। उनके अनुसार विकास का उनका अर्थ यह है कि भारत को केवल अतीत को याद नहीं करना चाहिए, बल्कि इसमें सुधार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। मोटे तौर पर यही विचार अरविंद, गांधी और टैगोर ने भी रखे। ये सभी शख्सियतें सांस्कृतिक तौर पर जमीन से जुड़ी होने के साथ खुले विचारों और नवाचारी सोच वाली थीं। ये विचारक आधुनिकता की चुनौतियों से समायोजित होने की जरूरतों को समझने के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी ताकत पाते रहे। इसीलिए आंतरिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की आध्यात्मिक मुक्ति पर ध्यान केंद्रित करते हुए ये विचारक भारतीय परंपराओं से भी जुड़े रहे। इतना ही नहीं, इन विचारकों ने राजनीतिक और सामाजिक स्वतंत्रता के पश्चिमी विचारों के महत्व को स्वीकार करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई।


आंबेडकर की गौतम बुद्ध के प्रति गहन श्रद्धा सर्वविदित है। पुस्तक में डाल्टन विवेकानंद, अरविंद और गांधी पर भी पड़े बुद्ध के उन प्रभावों को रेखांकित करते हैं, जिन पर कम ही चर्चा हुई है। डाल्टन ने अपनी किताब में दरअसल, इन विचारकों के जीवन और खासकर बुद्ध के उदाहरण को आध्यात्मिक मुक्ति के विचार के तौर पर देखा। इन विचारकों ने इस आदर्श को एक सामान्य बौद्धिक परंपरा के तौर पर स्वीकार किया है। पुस्तक में इन विचारकों के बेहतर ढंग से चयनित उद्धरण दिए गए हैं, जो पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। जैसे आंबेडकर कहते हैं, 'जब उद्देश्य सही होते हैं, तो इच्छाशक्ति को जाग्रत किया जा सकता है। मनुष्य बेशक बंधा हुआ है, लेकिन वह मुक्त हो सकता है। हालात कैसे भी हों, उसका उठाया गया पहला कदम उसे मुक्ति की दिशा में ले जा सकता है। मन को प्रशिक्षित किया जा सकता है। यह मन ही बंदी बनाता है। इस मन को ही अगर सही दिशा में मार्गदर्शित किया जाए, तो मुक्ति के द्वार खोल सकता है।'
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अंत में डाल्टन बताते हैं कि आखिर क्यों और किस तरह से टैगोर किताब के मूल संस्करण में दिए गए दूसरे तीन विचारकों से अलग हैं। ये सभी विचारक सामाजिक सुधार की प्राथमिक अनिवार्यता के साथ नैतिक या आध्यात्मिक स्वतंत्रता के विचार का समर्थन करते हैं। लेकिन टैगोर का अद्वितीय योगदान  उनके शुरुआती विचार से संबंधित है, जिसके मुताबिक भारत में राष्ट्रवाद का विचार स्वतंत्रता संग्राम की आग को भड़काए रखने में मदद कर सकता है, लेकिन यह नैतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता की राह में रोड़ा भी बन सकता है।


मेरा यह लेख आप आजादी की 76वीं वर्षगांठ से कुछ दिन पहले पढ़ रहे हैं। इस अवसर पर आप उन लोगों को भी खुद की शेखी बखारते सुनेंगे, जो आज देश पर शासन कर रहे हैं। लेकिन आजादी का सही अर्थ समझने के लिए देश के युवाओं को एक अमेरिकी विद्वान द्वारा लिखी यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। किताब में जानने-सीखने के लिए काफी कुछ है। मानवता का गहरा विचार लिए यह किताब ज्यादा से ज्यादा पढ़ी जाने योग्य है।

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