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साड़ी के टुकड़े-टुकड़े करने के बाद युवक को आखिर क्या मिला?

Fri, 06 Feb 2015 09:48 AM IST
श्रीकृष्णदत्त भट्ट
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एक जुलाहा था। वह स्वभाव से शांत, नम्र एवं निष्ठावान था। एक बार कुछ लड़कों को शरारत सूझी। उनमें एक लड़का धनवान माता-पिता का पुत्र था। जुलाहे के पास पहुंचकर उसने साड़ी की कीमत पूछी। जुलाहे ने कहा, दस रुपये। उस लड़के ने साड़ी के दो टुकड़े कर दिए और बोला, मुझे आधी साड़ी चाहिए। इसके क्या दाम होंगे? जुलाहे ने कहा, पांच रुपये। लड़के ने उस टुकड़े को भी दो भागों में बांट दिया, और फिर दाम पूछा। जुलाहे ने बताया, ढाई रुपये। लड़का साड़ी के टुकड़े करता गया और अंत में बोला, अब मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए। ये टुकड़े मेरे किसी काम के नहीं?
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जुलाहे ने शांत भाव से कहा, अब ये टुकड़े किसी के भी काम के नहीं रहे। लड़का बड़ा लज्जित हुआ। वह कहने लगा, मैंने आपका नुकसान किया है। मैं साड़ी का मूल्य चुका देता हूं। जुलाहे ने स्नेह से कहा, जब आपने साड़ी ली ही नहीं, तो मैं पैसे कैसे ले सकता हूं? लड़के के दर्प ने सिर उठाया, और उसने कहा, आप गरीब हैं, और आपके घाटे की भरपाई मुझे करनी ही चाहिए।

जुलाहे ने जवाब दिया, तुम यह घाटा पूरा नहीं कर सकते। जरा सोचो, किसान का कितना श्रम लगा, तब कपास पैदा हुई। फिर मेरी पत्नी ने कठिन परिश्रम से उस कपास को बीना और सूत काता। फिर मैंने उसे बुना और रंगा। इतने लोगों का श्रम तभी सफल होता, जब इसे कोई पहनता। अब बताओ, श्रम व सदुपयोग का घाटा भला रुपयों से कैसे पूरा हो सकता है?
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लड़का शर्म से पानी-पानी हो गया। वह जुलाहे के पैरों में गिर पड़ा। जुलाहे ने उसे उठाते हुए कहा, बेटा, यदि मैं रुपये ले लेता, तो मेरा काम तो निकल जाता, मगर तुम्हारे जीवन का वही हाल होता, जो साड़ी का हुआ। जीवन किसी काम का नहीं रहता।
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