उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में विगत डेढ़ वर्ष से ब्रज में यमुना जल लाने की एक मुहिम चलाई जा रही है। यमुना रक्षक दल नाम से बना संगठन इस मुहिम को भारतीय किसान यूनियन के एक टूटे हुए हिस्से के सहयोग से चला रहा है। इनकी मांग है कि यमुना में यमुना जल लाया जाए। जिसके लिए ये दिल्ली के हथिनी कुंड बैराज को हटाकर यमुना की अविरल धारा बहाने की मांग कर रहे हैं।
यह मांग कानूनी और भावनात्मक, दोनों ही रूप में उचित है कि यमुना में यमुना जल बहे। जबकि आज उसमें दिल्लीवालों का सीवर और प्रदूषित जल ही बह रहा है। मथुरा के हजारों देवालयों में श्रीविग्रह के अभिषेक के लिए हर प्रातः यही जल भरकर ले जाया जाता है, जिससे भक्तों और संतों को भारी पीड़ा होती है। यमुना स्नान करने वाले भी जल के प्रदूषित होने के कारण अनेक रोगों के शिकार हो जाते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यमुना का जल उसकी सहनशीलता से एक करोड़ गुना अधिक प्रदूषित है। यमुना एक मृत नदी घोषित हो चुकी है। वैसे भी देवी भागवत नाम के पौराणिक ग्रंथ में यह उल्लेख मिलता है कि कलियुग में गंगा और यमुना दोनों अदृश्य हो जाएंगी। पर प्रश्न यह है कि हथिनी कुंड बांध को हटाए जाने की मांग ही क्या यमुना के जीर्णोद्धार का सही विकल्प है?
आत्मप्रचार के बहाने यमुना शुद्धि का संकल्प लेने वालों की एक लंबी जमात है। पर इनमें से कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास यमुना की गंदगी के कारणों का संपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है? कितने लोग ऐसे हैं, जिन्होंने दिल्ली से लेकर इलाहाबाद तक यमुना के किनारे पड़ने वाले शहरों के सीवर और सॉलिड वेस्ट के आकार, प्रकार, सृजन व उत्सृजन का अध्ययन कर यह जानने की कोशिश की है कि इन शहरों की यह गंदगी कितनी है और अगर इसे यमुना में गिरने से रोकना है, तो इन शहरों में उसके लिए क्या आवश्यक आधारभूत ढांचा, मानवीय व वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं?
दिल्ली तक पैदल मार्च करना ठीक उसी तरह है कि यमुना के किनारे खड़े होकर संत समाज यमुना शुद्धि का संकल्प तो ले, पर उन्हीं के आश्रम में भंडारों में नित्य प्रयोग होने वाली प्लास्टिक की बोतलें, गिलास, थर्मोकोल की प्लेटें या दूसरे कूड़े को रोकने की कोई व्यवस्था न करें। इसे रोकने के लिए जरूरी होगा, मानसिकता में बदलाव। डिटर्जेंट से कपड़े और बर्तन धोकर हम यमुना शुद्धि की बात नहीं कर सकते। कितने लोग यमुना के प्रदूषण को ध्यान में रखकर अपनी दिनचर्या में और अपनी जीवनशैली में बुनियादी बदलाव करने को तैयार हैं?
दूसरी तरफ गंगोत्री के बाद विकास के नाम पर हिमालय का जिस तरह नृशंस विनाश हुआ है, जिस तरह वृक्षों को काटकर पर्वतों को नंगा किया गया है, जिस तरह डायनामाइट लगाकर पर्वतों को तोड़ा गया है और बड़े-बड़े निर्माण किए गए हैं, उससे यमुना का जल संग्रहण क्षेत्र लगातार संकुचित होता गया है। इसलिए स्रोत से ही यमुना जल की भारी कमी हो चुकी है।
यमुना में जल की मांग करने से पहले हमें हिमालय को फिर से हरा-भरा बनाना होगा। दूसरी तरफ मैदान में आते ही यमुना कई राज्यों के शहरीकरण की चपेट में आ जाती है। जो इसके जल का बेदर्दी से प्रयोग ही नहीं करते, बल्कि उसमें क्रूरता से पूरे नगर का रासायनिक व सीवर जल प्रवाहित करते हैं। इस सबके बावजूद यमुना इन राज्यों को उनके नैतिक और कानूनी अधिकार से अधिक जल प्रदान कर उन्हें जीवनदान कर रही है। पर दिल्ली तक आते-आते उसकी कमर टूट जाती है।
यमुना में प्रदूषण का सत्तर फीसदी हिस्सा केवल दिल्लीवासियों की देन है। जब तक यमुना जल के प्रयोग में कंजूसी नहीं बरती जाएगी और जब तक उसमें गिरने वाली गंदगी को रोका नहीं जाएगा, तब तक यमुना में जल प्रवाहित नहीं होगा। हथिनी कुंड बैराज खोल दिया जाए, या तोड़ दिया जाए, दोनों ही स्थितियों में यमुना में यमुना जल निरंतर बहने वाला नहीं है। यह एक भावातिरेक में उठाया गया कदम होगा।
यमुना रक्षक दल के इस आह्वान से भावनात्मक रूप से जुड़ने वाले ब्रज के संतों और ब्रजवासियों को भी इस बात का एहसास है कि इस आंदोलन ने मुद्दा तो सही उठाया, पर समस्या का समाधान देने की क्षमता इसके नेतृत्व के पास नहीं है।