कुछ साल पहले बांग्लादेश में कलाकार जयंत चट्टोपाध्याय की स्त्री मैत्रेयी ने पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। जितना मैंने सुना था, जयंत का किसी और महिला से प्रेम था। मैत्रेयी को यह सहन नहीं हुआ, इसलिए उसने आत्महत्या कर ली थी। थोड़े दिनों पहले बांग्लादेश के कलाकार काजी आरिफ की मृत्यु हुई। सुना है, कुछ साल पहले उनके प्रेम में सुमना मेहरून नाम की एक कवयित्री ने आत्महत्या कर ली थी। कभी कोई स्त्री अपने पति के व्यवहार से दुखी होकर आत्महत्या करती है, तो कभी कोई प्रेमिका अपने प्रेमी की उदासीनता से क्षुब्ध होकर अपना जीवन समाप्त कर देती है।
पुरुष असंख्य महिलाओं की मृत्यु के लिए जिम्मेदार हैं। पुरुषवर्चस्ववादी समाज में पुरुषों से प्रेम करने का खामियाजा स्त्रियों को भुगतना पड़ता है। इसके बाद भी लड़कियां पुरुषों से प्रेम करती हैं। औरत की आत्महत्या की हर घटना बताती है कि उसके जीवन का कोई मोल नहीं है। ऐसा नहीं है कि पुरुषों की आत्महत्याओं की घटनाएं सामने नहीं आतीं। बल्कि विकसित देशों में पुरुषों की आत्महत्या का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से अधिक देखने में आता है। लेकिन इसके पीछे प्रेम नहीं, बल्कि मानसिक समस्या और आर्थिक परेशानी जैसे कारण होते हैं।
पुरुष अमूमन स्त्री के प्रेम में बावले होकर आत्महत्या नहीं करते। फिर लड़कियां ही आत्महत्या क्यों करती हैं? इसलिए कि प्रेम करने पर लड़कियां बहुत कमजोर, बहुत असहाय हो जाती हैं, और खुद को तुच्छ भी समझने लगती हैं, जिनके जीवन का कोई मोल नहीं है। नारी प्रेम करती है, तो पुरुष के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने की भावना रखती है। दूसरी तरफ पुरुष प्रेम करता है, तो वह नारी को सुरक्षा देने के नाम पर उसके शरीर पर अपना अधिकार जताने की कोशिश करता है।
स्त्री
- फोटो : अमर उजाला
कुछ साल पहले बांग्लादेश में कलाकार जयंत चट्टोपाध्याय की स्त्री मैत्रेयी ने पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। जितना मैंने सुना था, जयंत का किसी और महिला से प्रेम था। मैत्रेयी को यह सहन नहीं हुआ, इसलिए उसने आत्महत्या कर ली थी। थोड़े दिनों पहले बांग्लादेश के कलाकार काजी आरिफ की मृत्यु हुई। सुना है, कुछ साल पहले उनके प्रेम में सुमना मेहरून नाम की एक कवयित्री ने आत्महत्या कर ली थी। कभी कोई स्त्री अपने पति के व्यवहार से दुखी होकर आत्महत्या करती है, तो कभी कोई प्रेमिका अपने प्रेमी की उदासीनता से क्षुब्ध होकर अपना जीवन समाप्त कर देती है।
पुरुष असंख्य महिलाओं की मृत्यु के लिए जिम्मेदार हैं। पुरुषवर्चस्ववादी समाज में पुरुषों से प्रेम करने का खामियाजा स्त्रियों को भुगतना पड़ता है। इसके बाद भी लड़कियां पुरुषों से प्रेम करती हैं। औरत की आत्महत्या की हर घटना बताती है कि उसके जीवन का कोई मोल नहीं है। ऐसा नहीं है कि पुरुषों की आत्महत्याओं की घटनाएं सामने नहीं आतीं। बल्कि विकसित देशों में पुरुषों की आत्महत्या का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से अधिक देखने में आता है। लेकिन इसके पीछे प्रेम नहीं, बल्कि मानसिक समस्या और आर्थिक परेशानी जैसे कारण होते हैं।
पुरुष अमूमन स्त्री के प्रेम में बावले होकर आत्महत्या नहीं करते। फिर लड़कियां ही आत्महत्या क्यों करती हैं? इसलिए कि प्रेम करने पर लड़कियां बहुत कमजोर, बहुत असहाय हो जाती हैं, और खुद को तुच्छ भी समझने लगती हैं, जिनके जीवन का कोई मोल नहीं है। नारी प्रेम करती है, तो पुरुष के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने की भावना रखती है। दूसरी तरफ पुरुष प्रेम करता है, तो वह नारी को सुरक्षा देने के नाम पर उसके शरीर पर अपना अधिकार जताने की कोशिश करता है।
यह और कुछ हो, पर प्रेम नहीं है। जिस संबंध में समानता नहीं है, वह प्रेम हो ही नहीं सकता।ऐसे में, नए सिरे से प्रेम को रचने की कोशिश लड़कियों को ही करनी होगी। लेकिन लड़कियों के बदलने से समाज तो नहीं बदलेगा। जब तक पुरुष नहीं बदलेगा, जब तक पुरुषवर्चस्ववादी समाज व्यवस्था की बुनियाद नहीं हिलाई जाएगी, तब तक पुरुष तंत्र द्वारा रची गई प्रेम की परिभाषा भी बरकरार रहेगी।
पुरुषों ने तो जता ही दिया है कि नारी के लिए प्रेम की परिभाषा क्या होनी चाहिए। हमारा सामाजिक विमर्श चीख-चीखकर बताता है कि पुरुष के बिना स्त्री का जीवन अर्थहीन है। सती प्रथा भले खत्म हो गई हो, लेकिन स्त्रियों को आज भी रोज अग्नि में अपना जीवन होम करना पड़ता है। पुरुषों का हित सोचने वाली स्त्रियां ही हमारी रोल मॉडल बनती हैं। लेकिन हमेशा पुरुषों का हित सोचना भी क्या खुद को दोयम दर्जे का मान लेना नहीं है?
मृत्यु और आत्महत्या के अतिरिक्त भी महिलाएं मारी जाती हैं। देर रात तक अपने पति का इंतजार करने वाली, हमेशा पति और पुरुषवर्चस्ववादी समाज की यातनाएं झेलने वाली और अपना मुंह बंद रखने वाली महिलाओं का होना न होने के बराबर ही है। पिछड़े और गरीब देशों में ऐसी महिलाओं की संख्या ही अधिक है।
प्रेम में पागल या हताश होने पर आत्महत्या कर लेने की महिलाओं की प्रवृत्ति को उनके कोमल हृदय का ही परिचायक माना जाता है। लेकिन मरना कोई कोमल प्रवृत्ति नहीं है। इसलिए स्त्री जब आत्महत्या करती है, तो अनजाने में ही वह पुरुष हो जाती है। जैसे पुरुष महिलाओं से घृणा करते हैं, वैसे ही महिलाएं खुद से घृणा करने लगती हैं। पुरुष जिस तरह महिलाओं की हत्या करते हैं, वैसे ही महिलाएं भी खुद को मार डालती हैं।
मैं लड़कियों और महिलाओं को हमेशा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए कहती हूं। अपने अधिकार के लिए लड़ने के लिए कहती हूं। मेरा मानना है कि खुद को दबी-कुचली और महत्वहीन समझकर स्त्री ने अपना बहुत नुकसान किया है। लेकिन मैं यह भी नहीं कहती कि महिलाएं पुरुष हो जाएं। स्त्री को स्त्री बनकर ही जीना होगा। यानी हम पुरुष निर्भर नहीं होंगे, लेकिन स्त्री के गुणों, उनकी विशेषताओं को बरकरार रखेंगे।
स्त्री जब स्त्री बनकर जिएगी, तो आत्महत्या बंद होगी। लड़की अपनी लड़कीपन के साथ जिएगी, तो लड़कियों के प्रति घृणा कम होगी। लड़की अपनी लड़कीपन के साथ जिएगी, तो पुरुषवर्चस्ववादी समाज ने लड़कियों के रूप और गुण का जो पैमाना तय किया है, उसे न मानकर इसका पैमाना वह खुद तय करेगी। स्त्री का पुरुष होना पुरुषों के कपड़े पहनना और पुरुषों का पेशा माने जाने वाले पेशों में अपनी प्रतिभा साबित करना नहीं है।
वह तो इस दौर में महिलाएं खूब कर रही हैं, जिसके लिए उन्हें बधाई भी दी जानी चाहिए। स्त्री का पुरुष हो जाने का मतलब है पुरुषवादी सोच को स्वीकार कर लेना। कोई भी स्वतंत्रचेता स्त्री पुरुषवादी सोच को स्वीकार नहीं कर सकती। पितृसत्ता ने तमाम पुरुषों को जिस मानसिकता से तैयार किया है, उस मानसिकता को अस्वीकार करना ही पुरुष होने को अस्वीकार करना है। जब तक लड़कियां यह काम नहीं करेंगी, तब तक वे पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता के साथ ही खड़ी हैं। इसी कारण अक्सर महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की लड़ाई में कुछ महिलाओं को भी पुरुषों के पाले में खड़े देखा जाता है।
पुरुष भले ही अपने अधिकार महिलाओं को न देना चाहे, लेकिन वह चाहता है कि उसकी पुरुषवादी मानसिकता को औरतें भी जस की तस स्वीकार करें। औरतों में यह मानसिकता है, तभी प्रेम करती लड़कियों को निर्ममता से मार डालने वाली माताएं हैं, अपराधी पतियों का साम्राज्य संभालती पत्नियां हैं, परिवारों में तानाशाह मां या दादियां हैं। दुनिया में पुरुषवर्चस्ववादी सोच टिकी हुई है, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि पुरुष ऐसा चाहते हैं, बल्कि यह इसलिए भी है, क्योंकि महिलाओं ने भी इस पुरुषवादी सोच को बनाए रखने में जाने-अनजाने मदद की है। इस सोच से मुक्ति में ही महिलाओं की मुक्ति छिपी है।