फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

सुलभ स्वास्थ्य सेवा की मंजिल: स्वास्थ्यकर्मियों को उच्च गुणवत्तापूर्ण सेवा देने में आसानी हो रही है?

डॉ. संजीव कुमार Published by: Raman Singh Updated Fri, 14 Jun 2019 07:38 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
डॉ. संजीव कुमार - फोटो : amar ujala

इस साल चुनावी घोषणापत्र में स्वास्थ्य सेवा को जगह मिली। स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन प्रतिशत तक बढ़ाने, भविष्य के 1,50,000  ‘वेलनेस सेंटर्स’ की सुविधाओं को उन्नत करने से लेकर स्वास्थ्य सेवा का अधिकार जैसे अनेक वादे किए गए। पर अब भी देश के सामने अनेक ढांचागत चुनौतियां हैं। भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां चिकित्सक-रोगी अनुपात सबसे खराब यानी 1:11.082 मात्र है। स्वास्थ्य सेवा सुलभता और गुणवत्ता सूचकांक, 2018 में भारत 145वें स्थान पर है, जो पड़ोसी बांग्लादेश, उप-सहारा सूडान और भूमध्यरेखीय गिनी से भी नीचे है।

चुनावी वादे को यथार्थ में परिणत करने के लिए स्वास्थ्य सेवा की मौजूदा अवसंरचना में संपूर्ण सुधार की जरूरत है। अधिक संख्या में अस्पतालों, चिकित्सकों और चिकित्सीय परिचारकों से लेकर और अधिक चिकित्सा संस्थानों के निर्माण की दिशा में एक अधिक सुदृढ़ सरकारी-निजी क्षेत्र भागीदारी (पीपीपी) तक मौजूदा चिकित्सीय अवसंरचना में गुणवत्ता, सुलभता और वहनीयता जैसे सभी पहलुओं में सुधारों की भारी आवश्यकता है।



पिछले वर्ष सरकार ने स्वास्थ्य सेवा सुधारने, मरीजों की जेब से खर्च कम करने और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच आसान करने के लिए विश्व की सबसे बड़ी बीमा योजना, आयुष्मान भारत लागू की। लेकिन क्या 6,400 करोड़ रुपये की निधि लाखों लोगों के इलाज के लिए पर्याप्त है? रिपोर्टें बताती हैं कि इसके सफल क्रियान्वयन के लिए कम-से-कम 1,00,000 करोड़ रुपये की जरूरत है। छत्तीसगढ़ का उदाहरण सामने है। सीएजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, चिकित्सीय अवसंरचना के मामले में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन सबसे खराब है।

विज्ञापन

डॉ. संजीव कुमार - फोटो : amar ujala
इस साल चुनावी घोषणापत्र में स्वास्थ्य सेवा को जगह मिली। स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन प्रतिशत तक बढ़ाने, भविष्य के 1,50,000  ‘वेलनेस सेंटर्स’ की सुविधाओं को उन्नत करने से लेकर स्वास्थ्य सेवा का अधिकार जैसे अनेक वादे किए गए। पर अब भी देश के सामने अनेक ढांचागत चुनौतियां हैं। भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां चिकित्सक-रोगी अनुपात सबसे खराब यानी 1:11.082 मात्र है। स्वास्थ्य सेवा सुलभता और गुणवत्ता सूचकांक, 2018 में भारत 145वें स्थान पर है, जो पड़ोसी बांग्लादेश, उप-सहारा सूडान और भूमध्यरेखीय गिनी से भी नीचे है।

चुनावी वादे को यथार्थ में परिणत करने के लिए स्वास्थ्य सेवा की मौजूदा अवसंरचना में संपूर्ण सुधार की जरूरत है। अधिक संख्या में अस्पतालों, चिकित्सकों और चिकित्सीय परिचारकों से लेकर और अधिक चिकित्सा संस्थानों के निर्माण की दिशा में एक अधिक सुदृढ़ सरकारी-निजी क्षेत्र भागीदारी (पीपीपी) तक मौजूदा चिकित्सीय अवसंरचना में गुणवत्ता, सुलभता और वहनीयता जैसे सभी पहलुओं में सुधारों की भारी आवश्यकता है।

पिछले वर्ष सरकार ने स्वास्थ्य सेवा सुधारने, मरीजों की जेब से खर्च कम करने और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच आसान करने के लिए विश्व की सबसे बड़ी बीमा योजना, आयुष्मान भारत लागू की। लेकिन क्या 6,400 करोड़ रुपये की निधि लाखों लोगों के इलाज के लिए पर्याप्त है? रिपोर्टें बताती हैं कि इसके सफल क्रियान्वयन के लिए कम-से-कम 1,00,000 करोड़ रुपये की जरूरत है। छत्तीसगढ़ का उदाहरण सामने है। सीएजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, चिकित्सीय अवसंरचना के मामले में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन सबसे खराब है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next