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किसानी का हक मांगती महिलाएं

Fri, 15 Sep 2017 10:38 AM IST
सुभाषिनी सहगल अली
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सुभाषिनी सहगल अली
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पिछले पंद्रह दिनों की घटनाएं देखें, तो लिखने को बहुत कुछ है। बलात्कारी राम-रहीम के अत्याचारों की न खत्म होने वाली फेहरिस्त; गौरी लंकेश की नृशंस हत्या;  गोरखपुर के बाद फर्रूखाबाद के जिला अस्पताल में बच्चों की मौत; एक दिन में तीन ट्रेनों का पटरी से उतर जाना; स्कूलों में बच्चियों के साथ दुष्कर्म और उनकी हत्याएं।
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एक बहुत बड़ी आपदा सामने खड़ी है, जिसकी तरफ कम लोगों का ध्यान जा रहा है। इस आपदा की शिकार लाखों गरीब, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं होने वाली हैं। आपदा इस बात से पैदा होने वाली है कि इस साल बारिश ठीक से नहीं हुई है। बारिश कहीं-कहीं तो बहुत अधिक हुई। पर देश के साठ फीसदी हिस्से में पानी कम गिरा है। देश में पैदा होने वाले अनाज का पचास प्रतिशत जिन राज्यों में पैदा होता है-यानी पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश-इनमे इस साल औसत से 39 प्रतिशत कम बारिश हुई है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल इस साल भी सूखाग्रस्त हैं। उनके लिए सूखे का यह तीसरा साल है। कहा जा रहा है कि इस साल पिछले साल के मुकाबले कृषि उत्पादन आधा रह जाएगा।

पिछले कुछ महीनों से कई राज्यों के किसान संघर्ष करते दिख रहे हैं। हर जगह मांगें वही हैं-फसलों का वाजिब दाम दो और कर्ज माफ करो। सरकारें इन मांगों को अनसुनी कर रही हैं और अपने मनपसंद बुद्धजीवियों-विशेषज्ञों द्वारा लेख लिखवा रही हैं कि यदि ये मांगें मान ली जाएं, तो देश दिवालिया हो जाएगा।
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आंदोलकारी किसानों में महिलाओं की संख्या कम नहीं हैं। ये महिलाएं घर का सारा काम करके आंदोलन में शामिल हो जाती हैं। ये दिन भर नारे लगाती हैं, फिर थकी-हारी घर जाती हैं। ये महिलाएं भी किसान हैं। पर उनको किसान कोई मानता नहीं है। ये महिलाएं खेतों में मजदूरी का काम करती हैं, अपने परिवार की जमीन पर खेती का काम करती हैं और अपने खेतों की देख-रेख भी करती हैं। ग्रामीण क्षेत्र से पुरुषों का पलायन बढ़ रहा है और उनकी जगह घर की महिलाएं ले रही हैं। ग्रामीण महिलाएं कृषि से जुड़े 85 प्रतिशत विभिन्न काम करती हैं। 20 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवारों की मुखिया भी महिला हैं। पशुओं को चारा देना, उनका दूध निकालना और दूध बेचना औरतों के काम हैं। पर उन्हें किसान या पशुपालक का दर्जा नहीं मिलता। वे खेत और जमीन की मालिक भी नहीं बन पातीं। लंबी लड़ाइयों के बाद कुछ कानूनी अधिकार उन्हें मिले भी, तो उनका फायदा अभी तक नहीं मिल पाया है। दो ही राज्यों-पश्चिम बंगाल और अविभाजित आंध्र प्रदेश में जमीन के संयुक्त पट्टे बांटे गए थे। महिलाएं चूंकि किसान नहीं मानी जातीं, इसलिए उन्हें न तो किसान पत्र मिल पाता है, न ही बैंक से कर्ज। इसीलिए किसानों के संघर्ष में उनकी संख्या बढ़ती जा रही है।  कहीं-कहीं उनके अधिकारों की मांग भी उठने लगी है। जिस सूखे की चपेट की बात अब सरकार करने लगी है, उसका इन ग्रामीण महिलाओं के जीवन पर सुनामी जैसा असर पड़ने वाला है। पुरुषों के पलायन के साथ महिलाओं का पलायन भी बढ़ेगा।

आने वाले दिनों की परेशानियां किसान आंदोलन को और धार देंगी। महिलाएं आंदोलनकारी तो बन ही रही हैं, उनकी मांगों को, उनके किसान होने की मान्यता को, उनके जमीन के अधिकार को अगर मुद्दा बनाया जाएगा, तो वे आंदोलन की नेता भी बनेंगी। निर्भीक और समझौता न करने वाली नेता। कभी पीछे न हटने वाली नेता।
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-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।
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