पाकिस्तान की कोई सीमा म्यांमार के साथ नहीं लगी है, फिर भी अपुष्ट आंकड़ों के मुताबिक, करीब तीन लाख रोहिंग्या मुसलमान मुल्क के तटीय शहर कराची में हैं, जो यहां दशकों से बसे हुए हैं। कराची सबसे अधिक रोहिंग्या मुसलमानों की मेजबानी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। पर अफगान शरणार्थियों के लिए पाकिस्तान में जिस तरह की नीति है, वैसी कोई नीति रोहिंग्या मुसलमानों के लिए नहीं है और उन्हें कोई पहचान पत्र भी नहीं दिया जाता।
म्यांमार की पश्चिमी सीमा जहां भारत और बांग्लादेश से लगी है, वहीं थाईलैंड और लाओस उसके पूरब में हैं तथा इसका पूर्वी और पू्र्वोत्तर क्षेत्र चीन से घिरा है। तो फिर लाखों रोहिंग्या मुसलमान पाकिस्तान के दक्षिणी शहर में कैसे रह रहे हैं, जिसका बुनियादी ढांचा पहले से ही ढहा हुआ है? यह सवाल तभी से पाकिस्तान में पूछा जा रहा है, जब से दुनिया भर के अखबारों में रोहिंग्या मुसलमानों के म्यांमार से पलायन की तस्वीरें सुर्खियां बनी हैं और एक बड़ा मानवीय संकट उठ खड़ा हुआ है।
रोहिंग्या मुसलमानों के अलावा पाकिस्तान में तीस लाख अफगान, बीस लाख बांग्लादेशी और पांच लाख अफ्रीकी, ईरानी, इराकी रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर अवैध रूप से रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों में से ज्यादातर भारत, बांग्लादेश होते हुए कराची पहुंचते हैं। ज्यादातर अफगानी शरणार्थियों को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग का कार्ड मिला हुआ है, इसलिए वे पूरे पाकिस्तान में स्वतंत्र रूप से आ-जा सकते हैं। वे दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी समूह हैं।
बीती सदी के सातवें और आठवें दशक के बीच रोहिंग्या मुसलमान विभिन्न वजहों से पाकिस्तान आए और फिर लौटकर अपने घर नहीं गए। म्यांमार के मुस्लिम कल्याण संगठन के अध्यक्ष नूर हसन अरकानी ने मीडिया को बताया कि 'कराची में करीब तीन लाख रोहिंग्या मुस्लिम रहते हैं। उनमें से एक लाख से अधिक पाकिस्तानी नागरिक बन गए हैं। शेष लोगों के पास राष्ट्रीय पहचान पत्र नहीं है, इसलिए वे स्वतंत्र रूप से शहर में आवाजाही नहीं कर सकते।'
कई अन्य मुल्कों की तरह पाकिस्तान भी आवाज उठाता रहा है कि रोहिंग्या मुसलमानों का उत्पीड़न और उन पर होने वाला अत्याचार रुकना चाहिए और उन्हें अपने देश में शांतिपूर्वक रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। पर विडंबना यह है कि मुल्क के राजनेताओं का दक्षिणपंथी धड़ा रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार का तो विरोध कर रहा है, लेकिन वह बलूचिस्तान में हजारा समुदाय, जो शिया हैं, की हत्या पर चुप रहता है। यह कोई रहस्य की बात नहीं है कि इनमें से कई दक्षिणपंथी सियासी पार्टियां उन जेहादी संगठनों के प्रति सहानुभूति रखती हैं, जो पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा के पीछे हैं।
बीते हफ्ते पाकिस्तान के करीबी सहयोगी चीन का रुख, जो आम तौर पर विदेश नीति के मुद्दों पर सहमत रहता है, रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में अलग दिखा। बीजिंग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विकास और स्थिरता की रक्षा के प्रयासों के लिए म्यांमार की सरकार का समर्थन करना चाहिए। पाकिस्तान ने देखा कि जब भारतीय प्रधानमंत्री ने म्यांमार का दौरा किया, तब भारत ने अपनी विदेश नीति में सुधार किया। हो सकता है कि उस पर बांग्लादेश का दबाव रहा हो, क्योंकि उससे पहले भारतीय विदेश सचिव कार्यालय के बयान में कहा गया था कि 'भारत म्यांमार के रखाइन प्रांत की स्थिति और वहां से शरणार्थियों के पलायन को लेकर चिंतित है।'
कोई भी देश लाखों शरणार्थियों की मेजबानी के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। जैसा कि हमने पाकिस्तान में अफगानी शरणार्थियों के मामले में देखा, जल्दी ही बेरोजगारी के कारण आपराधिक गतिविधियों में तेजी आएगी। कराची पुलिस ने शिकायत की कि रोहिंग्या मुस्लिम आतंकी गतिविधियों में संलिप्त हैं और उनके अल-कायदा तथा इस्लामिक स्टेट से संपर्क हैं। पुलिस के मुताबिक, शिक्षा और आजीविका की कमी ने इन्हें आतंकी संगठनों में भर्ती का आसान शिकार बनाया है।
रोहिंग्या लोगों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने में विफल रहने के कारण दुनिया भर में आलोचना के बाद म्यांमार की नेता आंग सान सू की ने इस महीने होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में न जाने का फैसला किया है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख जैद राद अल हुसैन ने म्यांमार पर रोहिंग्या अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले का आरोप लगाते हुए आशंका जताई कि लगता है, वहां उनका 'नस्ली सफाया' हो रहा है। पाकिस्तान (मलाला यूसुफजई) समेत दुनिया भर के एक दर्जन से अधिक नोबेल विजेताओं ने म्यांमार की नेता (जो स्वयं नोबेल विजेता हैं) को देश में सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए कहा है। इन नोबेल विजेताओं ने उन्हें 'नस्ली सफाया और मानवाधिकार के खिलाफ अपराध रोकने' के लिए कहा है।
पाकिस्तान में अनेक लोग इन विस्थापितों तक पहुंचना और उन्हें मदद करना चाहेंगे, पर उन तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा। म्यांमार के उस इलाके में सहायता भेजना मुश्किल है, पर इस्लामिक सहयोग संगठन के माध्यम से बांग्लादेश राहत समूहों को अपने क्षेत्र में पहुंचने की अनुमति दे सकता है। रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति बहुत दुखद है, पर कोई भी पड़ोसी मुल्क अपनी सीमा खोलने और उन्हें शरण देने को तैयार नहीं है। इसकी वजह है कि कुछ समय बाद वे शिविरों तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि मेजबान समाज का हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं।
म्यांमार सरकार को इसका शांतिपूर्ण समाधान खोजना चाहिए, ताकि उनके नागरिक अपने देश में रह सकें। अगर लंबे समय तक म्यांमार रोहिंग्या मुसलमानों का उत्पीड़न करता रहेगा, तो वह पूरी तरह से विश्व समुदाय से अलग-थलग हो जाएगा। कुछ हद तक लोकतंत्र हासिल करने के बाद वह पुराने दिनों की सैन्य तानाशाही में लौटने का जोखिम नहीं ले सकता।