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आधी आबादी: महिलाएं बन रहीं ग्रामीण विकास का इंजन, स्वयं सहायता समूह बने आर्थिक ताकत का आधार

मौसमी कबिराज Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 09 Mar 2024 05:58 AM IST

सार

एसएचजी ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का उपयुक्त माध्यम हैं, इसलिए इन्हें मजबूत किया जाना चाहिए।
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महिला स्वयं सहायता समूह (फाइल) - फोटो : ani


ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ग्रामीण महिलाएं एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता हैं। लेकिन 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की ग्रामीण कामकाजी आबादी में महिलाओं की संख्या 36.6 प्रतिशत, जबकि पुरुष की संख्या 78.2 प्रतिशत है। यहां महिला नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा देने में एसएचजी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे समुदाय और बड़े हितधारकों के बीच एक पुल का काम करते हैं। लेकिन, एसएचजी के भीतर सूक्ष्म-उद्यमों को अपने व्यवसाय को टिकाऊ बनाने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसमें तकनीकी जानकारियों का अभाव, पारंपरिक तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता, बाजार से अपर्याप्त संपर्क, सीमित कौशल प्रशिक्षण के साथ आत्मविश्वास और नेतृत्व कौशल की कमी जैसे कई कारण जिम्मेदार दिखाई देते हैं। चूंकि एसएचजी ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचने और महिला नेतृत्व वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने का उपयुक्त माध्यम हैं, इसलिए इन्हें मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं।


पहला कदम, सूक्ष्म उद्यम गतिविधियों से जुड़े एसएचजी को दीर्घकालिक बनाने के लिए उन्हें शुरू से अंत तक सहायता देना। इसमें क्षमता निर्माण प्रशिक्षण, वित्तीय संसाधनों तक पहुंच की सुविधा और बाजार संपर्क की सहायता शामिल है। इससे एसएचजी को चुनौतियों से निपटने, अवसरों का लाभ उठाने और आगे बढ़ने में मदद मिलती है, जो उनकी महिला सदस्यों के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान करता है।


दूसरा कदम, महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिकाओं के लिए तैयार करना। सफल महिलाओं के लिए ऐसे अवसर बनाने चाहिए, जहां वे अपनी सफलता की कहानियों को अन्य महिलाओं के साथ साझा कर सकें और उनमें आत्मविश्वास पैदा कर सकें। उदाहरण के लिए, राजस्थान के दूनी गांव की मीरा जाट डेयरी और कृषि उत्पादक कंपनी मैत्री महिला मंडल समिति की प्रमुख हैं। यह समिति राजस्थान में 8,000 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देती है। आज जब वे चुनौतियों और अपनी सफलता की कहानी अन्य महिलाओं को सुनाती हैं, तब वे अधिक से अधिक महिलाओं को कामकाजी समूह में शामिल होने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसा ही काम लखपति दीदियां भी कर सकती हैं, जिन्होंने एसएचजी के माध्यम से सफलता पाई है। वे सतत आय के विभिन्न उपायों को सामने लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।


तीसरा कदम, उत्पादकता और आय को बढ़ाने के लिए नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए प्रेरित करना। उदाहरण के लिए, सोलर सिल्क रीलिंग मशीन, सोलर ड्रॉयर, बायोमास-संचालित कोल्ड स्टोरेज जैसी कई स्वच्छ प्रौद्योगिकियां कठिन परिश्रम को घटाने और मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने में मदद करती हंै। सीईईडब्ल्यू और विलग्रो का अध्ययन बताता है कि स्वच्छ प्रौद्योगिकियों ने ग्रामीण भारत की 10 हजार से अधिक महिलाओं की सालाना आय को 33 प्रतिशत बढ़ाने में मदद करते हुए उनकी आजीविका में उल्लेखनीय सुधार किया है। राजस्थान में झाडोल गांव की आशापुरा एसएचजी की गायत्री सुथार के अनुभव को बतौर उदाहरण देखा जा सकता है। बिजली आपूर्ति में दिक्कत होने पर उन्हें डेयरी व्यवसाय में नुकसान उठाना पड़ता था। इससे बचने के लिए उन्होंने सोलर रेफ्रिजरेटर लगा लिया। अब वे सोलर रेफ्रिजरेटर को अपने कारोबार का रक्षक बताती हैं, क्योंकि इससे दूध की बर्बादी घटी है और आय बढ़ी है।

-साथ में अंगारिका गोगोई

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