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सोशल मीडिया में स्त्री

तस्लीमा नसरीन
Updated Thu, 20 Sep 2018 07:04 PM IST
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सोशल मीडिया में स्त्री

जो समाज में है, उसी की प्रतिच्छवि सोशल मीडिया में दिख रही है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। उदाहरण के लिए, घर और घर से बाहर महिलाओं को जिस तरह लांछित होना पड़ता है, सोशल मीडिया में भी उन्हें ठीक वैसी ही उपेक्षा मिलती है। सोशल मीडिया में अधिकतर पुरुष अपनी नारी विद्वेषी भावना बेहिचक प्रकट करते हैं। यह हमारे समय की भीषण सच्चाई है।



मैं अगर अपनी बात करूं, तो सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक और ट्विटर पर मुझे अक्सर बेहद कुत्सित भाषा में निशाना बनाया जाता है। बीती सदी के आठवें-नौवें दशक में हाट-बाजार, उत्सव, मेले आदि में मेरे खिलाफ अभियान चलाया जाता था। तब मैं अपने आलोचकों की पहुंच में नहीं होती थी। इसलिए वे भीड़ में मेरे खिलाफ अभियान चलाते थे, ताकि समाज में मेरा बहिष्कार किया जा सके। लेकिन आज फेसबुक और ट्विटर पर मैं वैसे आलोचकों की पहुंच में हूं। इसलिए सोशल मीडिया में मुझे घेरना, मुझे गालियां देना मेरे आलोचकों के लिए बहुत आसान हो गया है। मैं उनसे मात्र एक क्लिक की दूरी पर हूं।

 

इसलिए वे तमाम निष्ठुरता और बर्बरता मुझ पर उड़ेल देते हैं। ट्विटर और फेसबुक पर इन नारीविद्वेषी लोगों की टाइमलाइन पर जाने से मुझे पता चलता है कि ये समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं, इनका सुखी परिवार है, ये अच्छी नौकरी या व्यवसाय में हैं तथा परम धार्मिक हैं और पुरुषवर्चस्वाद में यकीन करने वाले हैं। इस तरह के लोग समाज की रीति-नीतियों से बेहतर तालमेल बनाकर चलते हैं। मुझे गलत तरीके से, अश्लील लहजे में गाली-गलौज करने पर इन्हें किसी को जवाब तो नहीं ही देना पड़ता, उल्टे इनके नारी विद्वेष को तार्किक बताया जाता है। फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणी करने का अधिकार मैंने सिर्फ उन्हीं लोगों को दिया है, जो मेरे मित्र हैं। इसके बावजूद जब-तब अनजाने लोग मेरी निजी जिंदगी में घुस आते हैं और मुझे अशालीन ढंग से निशाना बनाने लगते हैं।

 

मेरी बात अलग है-मैंने बहुत कम उम्र से ही नारीविद्वेषी कट्टर लोगों की आलोचनाएं झेलकर खुद को इस्पात जैसा बना लिया है, लेकिन सारी औरतें तो मेरी तरह नहीं हैं। वे इस तरह के वार नहीं झेल सकतीं। उनके लिए रोज-रोज पुरुषवर्चस्ववादी समाज की आलोचनाएं सहना आसान नहीं है। इससे वे टूट जाती हैं, सोशल मीडिया से दूरी बना लेती हैं या पुरुष समाज के बारे में उनके विचार बेहद नकारात्मक हो जाते हैं।


बांग्लादेश से बाहर कर दिए जाने के बाद मैंने सोचा था कि अब मैं कट्टर पुरुषतंत्र का निशाना नहीं बनूंगी। पहले कोलकाता, फिर यूरोप में रहते हुए सचमुच मैं वैसे लोगों के निशाने से बाहर थी। लेकिन सोशल मीडिया पर आने के बाद मेरे आलोचकों की संख्या कई गुना ज्यादा हो गई है। पहले सिर्फ बांग्लादेश के कट्टर लोग ही मुझे निशाना बनाते थे। लेकिन फेसबुक और ट्विटर पर मेरा विरोध करने वाले सिर्फ बांग्लादेश के नहीं हैं, वे दूसरे देशों के भी हैं। वे अभद्र भाषा में मुझ पर हमले करते हैं, मुझे अश्लील इंगित करते हैं, वे मेरा बलात्कार करने की धमकी देते हैं।


मेरा अपराध क्या है? यही कि मैं उदारता की बात करती हूं, मैं महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके अधिकारों की बात करती हूं। सोशल मीडिया पर अपनी लंबी सक्रियता के बाद मैं दो निष्कर्षों पर पहुंची हूं। एक यह कि सोशल मीडिया के खुलेपन और इसकी व्यापकता के बावजूद इस पर कट्टरवादी सोच का वर्चस्व है। और दूसरा यह कि महिलाओं के लिए यह मीडिया बेहद असुरक्षित, खतरनाक और कटु अनुभवों से भरा है। मैं गारंटी के साथ कह सकती हूं कि सोशल मीडिया पर आने वाली कोई भी लड़की-चाहे वह छोटी बच्ची हो, किशोरी हो, युवती, गृहिणी या वृद्धा हो-अश्लीलता, असभ्यता, गंदी मानसिकता, मानसिक अत्याचार या निर्यातन से नहीं बच पाती।

 

इस लिहाज से देखें, तो यह सिर्फ मेरी पीड़ा नहीं है, बल्कि पूरे नारी समाज की पीड़ा है। सोशल मीडिया पर महिलाओं को रोज ही कटु अनुभवों से गुजरना पड़ता है। कुछ इस पर अपनी प्रतिक्रिया, अपना क्षोभ जाहिर करती हैं, तो ज्यादातर महिलाएं चुप रह जाती हैं।
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सच तो यह है कि लड़कियों को समाज में जितनी बेइज्जती सहनी पड़ती है, ऑनलाइन उससे सैकड़ों गुना बेइज्जती से उसे दो-चार होना पड़ता है। समाज में कुछ ही लोग उन्हें गलत नजरों से देखते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर उन्हें गलत नजरों से देखने वाले, उनसे गलत तरीके से पेश आने वाले लोगों की संख्या सैकड़ों और हजारों में होती है। इस कारण वे लड़कियां पढ़ाई या अपने काम में मन नहीं लगा पातीं। इस वजह से उनका आत्मविश्वास रसातल में चला जाता है। ऐसी भी लड़कियां हैं, जो यह सब सहन नहीं कर पातीं और आत्महत्या कर लेती हैं।


चूंकि सोशल मीडिया आज की सच्चाई है, इसलिए इसका बहिष्कार भी नहीं किया जा सकता। लेकिन सोशल मीडिया पर पुरुषों को भद्रता से पेश आने के लिए तो कहा ही जा सकता है। मानवाधिकार की इतनी वेबसाइटें अस्तित्व में हैं, वे इस दिशा में कोई पहल क्यों नहीं करतीं? सरकारें भी तो इस संदर्भ में अपनी खामोशी तोड़ सकती हैं। ध्यान रहे कि सोशल मीडिया पर व्याप्त यह नारी विद्वेष महिलाओं के साथ-साथ पुरुष समाज का भी नुकसान कर रहा है। वह इस अर्थ में कि सोशल मीडिया से नए-नए जुड़ने वाले असंख्य किशोर और युवा भी अपने वरिष्ठ पुरुष साथियों की देखादेखी नारी विद्वेषी बन जाते हैं।


हमारे घर में ही भाइयों को बहनों से श्रेष्ठ बताया जाता है। फिर सोशल मीडिया पर भी किशोरों को यही पाठ मिलता है। इस तरह हमारी युवा पीढ़ी की सोच नारी विद्वेषी, नारी-विरोधी की बन जाती है। ऐसा नहीं है कि हर पुरुष नारी विद्वेषी ही होता है। लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसे भद्रजन कम ही होते हैं। आभासी दुनिया में इस तीव्र नारी-विरोध को आज अगर गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका नुकसान भावी पीढ़ियों को झेलना पड़ेगा।  

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