दिल्ली में नवगठित आम आदमी पार्टी की सरकार ने अपने दो महत्वपूर्ण वायदों को पूरा करते हुए दिल्ली वालों को हर महीने बीस हजार लीटर मुफ्त पानी और 400 यूनिट बिजली की दरें आधी करने की घोषणा की है। पार्टी ने महिला सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए सीसीटीवी कैमरे लगाने और बसों में होमगार्ड के जवानों को तैनात करने की भी बात की है। लेकिन दुख की बात यह है कि नए ढंग की राजनीति करने का दावा करने वाली इस सरकार के मंत्रिमंडल में एक भी महिला शामिल नहीं है। जाहिर है, इससे कोई बढ़िया राजनीतिक संदेश नहीं निकलता है। कहा जा रहा है कि दिल्ली विधानसभा गठन के बाद पहली बार किसी महिला को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है।
दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया से जब महिलाओं की उपेक्षा से संबंधित सवाल पूछा गया, तो उन्होंने साफ कहा कि उनकी पार्टी की जिला समन्वयक समितियों में समन्वयक या उप समन्वयक में से एक पद महिला को देना अनिवार्य है। अगर दोनों पदों पर महिलाएं हों, तो और अच्छी बात है। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया से पार्टी में महिला नेतृत्व का विस्तार होगा। इसी राजनीतिक मंशा से आम आदमी पार्टी ने अपनी महिला शाखा का गठन किया था।
हालांकि दिल्ली अकेला ऐसा प्रदेश नहीं है, जहां एक भी महिला मंत्री नहीं है। कई राज्यों में तो सदन में महिला विधायक तक नहीं है। लेकिन यह भी गौर करने की बात है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है, जहां 2011 की जनगणना के मुताबिक, महिला साक्षरता दर 80.8 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत (64.8) से अधिक है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी से इसलिए लोगों को ज्यादा अपेक्षा है, क्योंकि यह पार्टी वैकल्पिक राजनीति के दावे के साथ दीर्घावधि में राष्ट्रीय विकल्प बनना चाहती है।
दिल्ली के 70 विधानसभा सीटों वाले सदन में महज छह महिला विधायक का चुनकर आना सभी राजनीतिक दलों के साथ-साथ राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रयासरत संगठनों /संस्थाओं को भी आत्मालोकन का अवसर देता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में 63 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी ने केवल 19 महिलाओं को टिकट दिया था। भाजपा ने आठ, कांग्रेस ने पांच, तो आप ने छह महिलाओं को टिकट दिया था। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में इन तीनों राजनीतिक दलों ने 17 महिलाओं को टिकट दिया था। इसी तरह दिल्ली की सात लोकसभा सांसदों में से छह पुरुष और एक महिला है।
किसी भी राजनीतिक दल के संविधान में टिकट वितरण की प्रक्रिया में महिला व पुरूष के बीच भेदभाव करने का जिक्र नहीं है, पर जमीनी हकीकत एक खुली किताब है, जो बताती है कि राजनीति में महिलाओं के साथ कितना भेदभाव बरता जाता है। यही वजह है कि संसद में वर्षों से महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो पाया है। गौरतलब है कि मुल्क को आजाद कराने में महिलाओं के योगदान को महात्मा गांधी ने भी सराहा था, पर सियासत में हिस्सेदारी के नाम पर आज भी उनकी उपेक्षा जारी है। यों तो सोनिया गांधी, जयललिता, मायावती, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत और हैसियत अपने आप में एक मिसाल है। इस देश में इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर महिला प्रधानमंत्री रही हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की नेता सुप्रिया सूले ने भी अपनी पार्टी की महिला शाखा की शुरुआत इसी मकसद से की थी कि राजनीति में महिलाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।
सवाल उठता है कि संसद व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण बिल का इंतजार आखिर कब तक करना होगा। महिलाओं को राजनीति का मोहरा बनाने वाले राजनीतिक दलों की यह जवाबदेही बनती है कि वे महिलाओं को उनका उचित प्रतिनिधित्व दें। 'आप’ के नेता एवं राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का कहना है कि हम राष्ट्रीय राजनीति में सैद्धांतिक ताकत के रूप में उभरना चाहते हैं।’ पर दरकार इससे पहले दिल्ली के सौ प्रतिशत पुरुष मंत्रिमंडल वाले चेहरे को लैंगिक नजरिये से शीघ्र दुरस्त करने की है। क्या आम आदमी पार्टी के साथ-साथ सभी राजनीतिक दलों का शीर्ष नेतृत्व अपने पार्टी संगठन एवं अपनी -अपनी सरकारों में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने पर संजीदगी से विचार करेगा।