जय हो। जय हो। सारा देश गुनगुना रहा था। विदेश में सीरीज हारने के बाद एशिया कप में जीतने की पूरी तैयारी थी। इतने अच्छे-अच्छे बल्लेबाज और अच्छे गेंदबाज, अच्छी कप्तानी। जीतना बिल्कुल तय ही था। सब-कुछ ठीक था कि अचानक अपनी टीम टूर्नामेंट से ही बाहर हो गई। इतने स्टार खिलाड़ी थे। देश की जमीं पर कितने चौके-छक्के लगा रहे थे। शतक पर शतक, पर बाहर जाते ही न जाने क्यों, हार गए। पर हम भी क्या करें? कोई रोज-रोज तो पहाड़ नहीं खोदेगा।
और फिर ऐसी बात नहीं है कि हमने कोशिश नहीं की। बहुत कोशिश की। हमारी प्रतिभा पर किसी को उंगली उठाने की जरूरत नहीं है। अरे, कभी आप हमें विज्ञापन करते देखोगे, तो पता चलेगा कि हम कितने समर्पण भाव से काम करते हैं। और फिर क्या हमने बार-बार का ठेका ले लिया है? हमेशा बस हम ही जीतते रहें? क्या दूसरे देश की टीम में प्रतिभाएं नहीं हैं? कभी-कभी उन्हें क्यों नहीं जीतना चाहिए?
अपने देश में तो हम जीतते ही रहते हैं। इसीलिए देश से बाहर जीतने की बात सोचनी हमने छोड़ दी है। हमसे दूसरे लोगों की खुशी नहीं छीनी जाती। और जीत-हार से होता क्या है? असली काम तो हम कर ही रहे हैं। आज विश्व में कितनी समस्याएं हैं। मंदी को ही लीजिए। इसने समूची दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बड़ी-बड़ी कंपनियां फेल होती जा रही है। ऐसे में हम आगे आ रहे हैं। क्रिकेट को एक तरफ रख हम जनकल्याण के लिए विज्ञापन कर रहे हैं। इतने महत्वपूर्ण कार्य के सामने हार-जीत क्या मायने रखते हैं? अब चैनलों पर बहस शुरू हो गई है। रिटायर्ड खिलाड़ी यही बातें करते रहते हैं, इसको खिलाते, तो ऐसा होता, बाकी हम जानते हैं कि कुछ नहीं होता।
और फिर हार गए, तो इतना हल्ला क्यों? आगे बहुत टूर्नामेंट हैं। अब देखो, आईपीएल आ रहा है। कितने करोड़ों की बोली लगी है, हमारा मन तो वहीं लगा हुआ है। आज अच्छा नहीं खेलते, तो कौन पैसे देता है? और साहब, ये कमबख्त पिच की मिट्टी में न जाने क्या मिला देते हैं। अब गेंद ही कितनी तेज आती है! इतनी उछाल देखकर मन डर जाता है कि कहीं लग-लगा गई, तो आईपीएल में करोड़ों का नुकसान हो जाएगा। सो, हम तो झट से हट जाते हैं। एक विकेट के लिए कौन जान से खेलेगा? इसी तरह गेंद फेंकने में सारी जान यहीं लगा दें, तो वहां क्या करेंगे? चीयरलीडर्स पर क्या इंप्रेशन पड़ेगा?