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महिलाओं के खिलाफ हिंसा क्यों नहीं है मुद्दा

Thu, 17 Apr 2014 07:03 PM IST
सुभाषिनी अली
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जब भी अखबार या टेलीविजन पर किसी लड़की या बच्ची या महिला या बुजुर्ग महिला के साथ हुई हिंसा की खबर छपती है या दिखाई जाती है, उसके बाद हिंसा के कारणों की खोजबीन सिर्फ अखबारों के पन्नों और टीवी चैनलों में नहीं, बल्कि ट्रेन के डिब्बों में, बसों में, चाय की दुकानों पर, स्कूल-कॉलेजों में, घरों और झोपड़ियों में शुरू हो जाती है। तरह-तरह के कारण सुझाए जाते हैं। लड़कियों के कपड़े, उनका स्कूल जाना, उनका आजादी के साथ घूमना, उनके हाथ में मोबाइल फोन का होना...य़हां तक कि किसी खाप के सदस्य ने यह भी कह दिया कि चाऊमीन खाने से लड़कियों पर हिंसात्मक घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है।
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लोकसभा के चुनावी अभियान के दौरान, इस बढ़ती हिंसा के कुछ असली कारण काफी स्पष्ट हो रहे हैं। पंद्रह दिन पहले, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में पश्चिम बंगाल की सरकार के काम करने के तौर-तरीकों की कड़ी निंदा की। मामला इस प्रकार था- तीन माह पहले बीरभूम जिले के एक आदिवासी गांव की पंचायत ने एक महिला के खिलाफ फरमान जारी किया कि चूंकि उसका संबंध एक गैर-आदिवासी लड़के के साथ है, इसलिए उसके परिवार को 25,000 रुपये का दंड भरना होगा।

गरीब परिवार के लिए यह रकम जुटाना संभव नहीं था, तो पंचायत ने सजा के तौर पर महिला के साथ सामूहिक बलात्कार करने की सजा सुनाई। 10-12 लोगों ने उसके साथ पूरे गांव के सामने बलात्कार किया। किसी तरह से हिम्मत जुटाकर वह अपने परिवार के साथ गांव से भाग निकली और दो दिन के बाद प्रशासन हरकत में आया। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, राज्य सरकार की लापरवाही की वजह से ही यह वहशीपन संभव था।
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इसके कुछ ही दिन के बाद जब पूरा देश इस बात पर खुशी जता रहा था कि मुंबई के सामूहिक बलात्कार कांड के आरोपियों को तीन-चार महीने के अंदर ही सजा सुना दी गई है, ऐन उसी मौके पर मुलायम सिंह ने एक आम सभा में इसकी आलोचना करते हुए कहा कि लड़कों से कुछ गलतियां हो ही जाती हैं, इसकी इतनी कड़ी सजा नहीं दी जानी चाहिए।

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें मौका मिला, तो वह बलात्कार के कानून की सख्त धाराओं को संशोधित करेंगे। उनका कथन कितना आश्चर्यजनक है! जिन लड़कों को सजा सुनाई गई थी, वे दो सामूहिक बलात्कार के मामलों में दोषी ठहराए गए हैं। क्या उनके अपराध को छोटी भूल समझा जा सकता है? बलात्कार के खिलाफ जो कानून बना है, वह भी पूरी तरह तरह से संतोषजनक नहीं है, लेकिन मुलायम सिंह उसके द्वारा प्रदत्त किए जाने वाली सुरक्षा से भी महिलाओं को वंचित रखना चाहते हैं।

मुलायम सिंह के भाषण के दिन ही नरेंद्र मोदी ने अपना चुनावी पर्चा भरा था। इसके पहले भी उन्होंने कई बार चुनाव लड़ा है और करीब तीस वर्षों से इस बात की कसम खाते रहे हैं कि उनकी कोई पत्नी नहीं है। इस बार उन्होंने माना है कि उनकी पत्नी है। यह बात सही है कि पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, पर किसी महिला की पत्नी होने की पहचान ही उससे छीन लेना, 40 वर्षों तक उसको इस पहचान से वंचित रखना उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय है। मोदी के पैरोकार बता रहे हैं कि उनकी पत्नी उनके लिए व्रत रहती हैं। इसका तो यही मतलब हुआ कि पतिव्रता के धर्म की अपनी परिभाषा के हिसाब से वह अपना काम कर रही हैं, लेकिन सवाल तो यह है कि पति ने पतिधर्म का पालन करने की कितनी कोशिश की।

इस चुनावी अभियान में महिलाओं की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों ने उनके प्रति अपनी सोच और अपने व्यवहार का जो प्रदर्शन किया है, उससे महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा का रहस्य अब रहस्य नहीं रहा।
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