आप से बहुत तंग आ गया हूं मैं। तय ही नहीं कर पाता हूं कि कोई बात मुझसे कही जा रही है या आम आदमी पार्टी के लिए! कल पत्नी कह रही थी कि आपने कमाल कर दिया! कुछ देर मैं शरमाता रहा, पर जब वह कुछ नहीं बोली, तो मैंने पूछ लिया कि क्या कमाल कर दिया मैंने, तो हंसते हुए कहने लगी, मैं तो आप की बात कर रही थी, केजरीवाल वाली।
आपका यह रवैया ठीक नहीं है, पिताजी ने कहा, तो मैं कांप गया, क्योंकि पिताजी जब भी मुंह फुलाते हैं, मुझे तू से आप कहने लगते हैं।
कुछ गलती हो गई क्या? मैंने पूछ ही लिया।
अरे, चुनाव के बीच में केजरीवाल अब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के फैसले को गलत बता रहे हैं। गलती तो की ही थी। पर उसे स्वीकार कर अपनी भद क्यों पिटवाना चाहते हैं? पिताजी गुस्से में थे, पर वह मेरे नहीं, आप के रवैये से नाराज थे।
आप सुनते ही मेरे बैठे हुए कान तनकर खड़े हो जाते हैं। हर बार यह पूछना भी तो अच्छा नहीं लगता है कि किस आप की बात कर रहे हैं आप।
दिल्ली के बाद आप का सफर आगे बढ़ सकता है क्या? किसी ने पूछ लिया।
यह आपसे किसने कहा कि मैं दिल्ली जा रहा हूं! मैंने जवाब दिया।
अरे भई, मैं तो केजरीवाल की बात कर रहा था, उसने बताया।
इस आप ने तो मुझे शीला दीक्षित से भी ज्यादा परेशान कर रखा है। मेरा बस चले, तो मैं सभी से कह दूं कि मुझे तुम कहा करो। पत्नी से कहा, तो वह बोली, अकेले में तो बोल सकती हूं, पर सबके सामने कैसे बोलूं!
आज सुबह बेटा बोला, आपके साथ जाऊंगा मैं।
मैं खुश हुआ कि बेटे की राजनीति में दिलचस्पी जाग उठी है। युवा पीढ़ी के लिए तो आदर्श है आप। बिलकुल जाओ, मैंने आशीर्वाद की मुद्रा में कहा!
अरे, मैं रिसेप्शन की बात कर रहा हूं। मां और बहन नहीं जा रहे, तो क्या? मैं चलूंगा आपके साथ!
न जाने कितने दिनों बाद मैंने अपने लिए आप सुना है। वरना सभी ‘आप’ के लिए ही आप-आप कर रहे हैं।