हमारे नीतिग्रंथों में कहा गया है कि जननी जन्मभूमि से बढ़कर संसार में कोई दूसरी वस्तु नहीं, यहां तक कि स्वर्ग का महत्व भी जन्मभूमि के सामने कम ही है।
स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी विनायक दामोदर सावरकर जीवन भर इसी विश्वास को मानते रहे। यह प्रसंग उन दिनों का है, जब वह नासिक में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। दूसरी ओर 'मित्र मेला' संस्था के माध्यम से वह गुप्त रूप से युवकों को स्वाधीनता प्राप्ति के यज्ञ में आहुतियां देने के लिए प्रेरित करते रहते थे।
महारानी विक्टोरिया के निधन का समाचार मिलते ही श्रद्धांजलि कार्यक्रमों की होड़ मच गई। ‘मित्र-मेला’ को सरकारी कोप से बचाने के लिए कुछ सदस्यों ने संस्था की ओर से महारानी विक्टोरिया को श्रद्धांजलि दिए जाने का सुझाव दिया।
विनायक दामोदर ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा, इंग्लैंड की महारानी ने स्वातंत्र्य समर को कुचलने का आदेश देकर असंख्य भारतीय राष्ट्रभक्तों की हत्या कराई। वह हमारे देश को दासता की बेड़ियों में जकड़ने वाले, हमारी कमाई से मौज उड़ाने वाले अंग्रेजों की रानी हैं, भारत की नहीं। हम एक हृदयहीन विदेशी रानी को श्रद्धांजलि क्यों दें?
और अकेले सावरकर की गर्जना ने 'मित्र-मेला' द्वारा रानी विक्टोरिया को श्रद्धांजलि अर्पित किए जाने के प्रस्ताव को तार-तार कर डाला।