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निशाने पर सिर्फ केजरीवाल ही क्यों

Fri, 11 Apr 2014 07:31 PM IST
कुमार प्रशांत
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यह संभवत: अरविंद केजरीवाल पर हुआ पांचवां हमला है! दिल्ली में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन एक ऑटोवाले से थप्पड़ खाने के बाद केजरीवाल अपने साथियों के साथ बापू-समाधि पर लंबे मौन पर बैठे। अगर ये हमले इस कारण हो रहे हैं कि आप ने अपने वायदे पूरे नहीं किए, तो मुझे डर है कि देश की हर सड़क पर, हर पार्टी का हर नेता पिटता नजर आएगा।
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अगर 49 दिनों की सरकार की विफलता का यह सिला है, तो 65 वर्षों तक सत्ता की बंदरबांट करने वालों का क्या अंजाम होगा? लेकिन भाजपा, कांग्रेस, सपा या बसपा पर हमला नहीं हो रहा! क्या हम मानकर चलें कि इन दलों ने अपने शासनकाल में वह सब कुछ पूरा कर दिया, जो कहा था? ऐसा दावा तो ये भी नहीं करते! या यह माना जाए कि जिन्होंने कुछ किया नहीं, लोगों के मन में कोई आकांक्षा पैदा ही नहीं की, वे सब आज लामबंद हुए हैं कि यह आप मार्का राजनीति यदि चलेगी, बढ़ेगी, तो हमारे लिए मुसीबत बन जाएगी। इसलिए दिल्ली में ही नहीं, बनारस में, अहमदाबाद में और हरियाणा में भी हमले हुए। तो केजरीवाल की यह आशंका आधारहीन नहीं लगती कि इन हमलों के पीछे कोई है!

यह बात फैलाई गई है कि दिल्ली की सरकार को 49 दिनों में छोड़कर निकल आना गलत था। ठीक है कि आप ने जिस तरह सरकार छोड़ी, वह सुविचारित रणनीति नहीं थी; न उसके पीछे की पूरी बात देश के सामने रखी जा सकी! लेकिन कांग्रेस व भाजपा के तर्क से चलें, तो सबसे पहली भगोड़ी तो भाजपा है, जिसे दिल्ली के मतदाता ने सबसे ज्यादा सीटें दी थीं! वह सरकार बनाने की जिम्मेदारी से क्यों भागी? और कांग्रेस अपने भगोड़ेपन पर क्या कहेगी, जिसने आप का बिना शर्त समर्थन किया था, फिर अचानक शर्त लगाई और सरकार गिरा दी?
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सरकार अगर कोई औजार है, जिससे जनता के काम किए जाते हैं, तो वह औजार काम का है कि नहीं, इसका फैसला वही कारीगर कर सकता है, जो वह औजार चला रहा होता है। आप ने इसका आकलन किया और उसे लगा कि इस औजार को पकड़े रहकर भी वह कुछ खास नहीं कर पाएगी, तो उसने उसे छोड़ दिया! औजार भोथरा हो, तो भी उसे चलाते रहने की भंगिमा आप को कांग्रेस या भाजपा की कतार में ला खड़ा करती। जब 13 दिनों की सरकार चलाकर अटल बिहारी वाजपेयी लोकसभा से निकल कर सीधे राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने गए थे, तब क्या वह भगोड़े थे? सत्ता से चिपककर बैठना, पर वह सब कर नहीं पाना, जिसका वायदा कर जनता से आपने वोट लिया था, बहुत बड़ी अनैतिकता है।

अपने 49 दिनों की सरकार में आप ने कम-से-कम 49 नए काम करने की शुरुआत तो की थी, लेकिन उसने पाया कि नौकरशाही और विधि-विधान ऐसे बने हैं कि आप निकम्मों की तरह 10 क्या, 15 वर्षों तक सत्ता में बैठे रह सकते हैं, पर बुनियादी परिवर्तन का एक काम नहीं कर सकते! उनका यह फैसला किसी को गलत भी लग सकता है, लेकिन उसके लिए कोई मतदाता दिल्ली, बनारस, हरियाणा जा-जाकर उन पर हमले करेगा, यह गले उतरने की बात नहीं है।

केजरीवाल ने यह ठीक किया कि अपने समर्थकों को जवाबी मारपीट न करने की हिदायत दी। उन्होंने यह भी ठीक किया कि ऐसे हमलों से घबरा कर सरकारी सुरक्षा बढ़ाने की मांग नहीं की। लेकिन आप को सोचना चाहिए कि उसका संगठन कहां है। सभी दलों के संगठन नारेबाजी और दादागीरी करने वाली भीड़ में बदल गए हैं, क्योंकि उनके नेताओं को इससे अलग कुछ चाहिए नहीं। लेकिन आप को समझना होगा कि उसका राजनीतिक संगठन सुरक्षा, संयोजन, संवाद, विमर्श करने में अव्वल नहीं होगा, तो भटकता ही रहेगा।
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थप्पड़ से यदि यह गूंज उठी है, तो उसे दूर तक जाना चाहिए!
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