हम सबका चहेता वैलेंटाइन-डे आखिर आ ही गया दिलों पर दस्तक देने। घबराने या डरने की जरूरत नहीं है। जैसे हर साल सोचते हैं, प्लान करते हैं, ठीक उसी तरह इस बार भी पूरे जोशो-खरोश के साथ सेलिब्रेट करना है। यही तो एक त्योहार है, जिसे हम मन से मनाते हैं।
बाकी त्योहारों में तो परिवार और समाज का दबाव काम करता है। वर्ना हमारे लिए तो उनका कोई मतलब ही नहीं। लेकिन कितनी दुखद बात है कि जिस त्योहार को हम धूमधाम से मनाना चाहते हैं, उस पर हमारे परिवार और समाज की वक्र दृष्टि रहती है। पड़ोस में, पार्क में, मॉल में लाल गुलाब किसी को पेश करने चलें, इससे पहले ही हमें धर लिया जाता है। हमारी सामूहिक कुटाई-पिटाई का कार्यक्रम शुरू हो जाता है। ऐसा बताने का प्रयास होता है कि हम कितना बड़ा पाप करने जा रहे थे।
हालांकि अपने यहां यह कोई बडा इश्यू नहीं है, क्योंकि कुटने-पिटने का भी अपना एक अलग मजा होता है। समाज से पिटने का क्या डर! वे तो नासमझ हैं। सुकरात या ईसा मसीह के शब्दों में कहें, तो हमें पीटने वाले जानते नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। कितनी बड़ी गलती कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि इस दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों को हमेशा पिटना पड़ा है, कुर्बानियां देनी पड़ी है। कोई बताए कि प्रेम करना गलत और पिटाई करना सही कैसे हो गया! जिससे मैं प्रेम करता हूं, उसे लाल गुलाब पेश करना जुर्म कैसे हो गया?
अब वेलेंटाइन डे के समय मैं मजनूं, रोमियो या रांझा वगैरह की कुटाई का जिक्र कर अपना और आप सबका मजा खराब नहीं करना चाहता। हां, यह जरूर कहना चाहता हूं कि परिवार और समाज की कुटाई से जब वे नहीं डरे, तो हम क्यों डरें! हां, ऐसे वक्त में जिन्हें फूल पेश करना है, अगर वे पीटने को आमादा हो जाएं, तो बात अलग है। वैसे तो इस तरह की बातें अपने दोस्तों को नहीं बताई जातीं, क्योंकि नाजनीनों के हाथों पिटना बहुत शर्मनाक होता है। लेकिन गम खाकर हम नए रास्ते पर चल पड़ते हैं। दूसरे काम की तरह प्रेम के रास्ते में भी बाधाएं तो आती ही रहती हैं। इससे हम वह रास्ता छोड़ तो नहीं सकते।
उम्मीद करता हूं दोस्तो कि वैलेंटाइन डे आपका भी अच्छा गुजरेगा। किसी की टेढ़ी नजर या मोटे डंडे से सामना नहीं होगा। उम्मीद पर ही दुनिया कायम है दोस्तो। एक बार प्रेम से बोलिए-हैप्पी वैलेंटाइन डे।