टीवी चैनलों पर अपनी पसंद के सीरियल या राजनेताओं के अशिष्ट बयानों पर राजनीतिक पार्टी-प्रवक्ताओं में होती बहसबाजी देखते-सुनते जब लगातार कमर्शियल ब्रेक की चाबुक पड़ती है, तब दर्शक बेचारा तिलमिला उठता है। यदि वह साहित्य-नृत्य-संगीत कलाओं का पुराना प्रेमी हुआ, तो उसे कष्ट दोहरा होने लगता है। एक कष्ट कथानक की निरंतरता में रसभंग होने का, दूसरा कष्ट कमर्शियल विज्ञापनों से सुलभ मोटी कमाई के मौके पर हिंदी साहित्य की नामचीन हस्तियों के साथ अन्याय होने का।
पद्मविभूषण कथक नृत्य गुरु नर्तकियों की ऊर्जा बढ़ाने हेतु च्यवनप्राश की बिक्री बढ़ाने की सिफारिश करते देखे जा सकते हैं। सदी के फिल्मी महानायक टीवी के मंच से देश की जनता को क्रीम, तो कभी शहद, तो कभी बच्चों की भूख मिटाने को मैगी-नूडल्स से बहला सकते हैं। इसके अलावा हर साल गरीबी मिटाने के वास्ते हॉट सीट पर विराजित को करोड़पति बनाने का जिम्मा लेकर खुद भी करोड़ों में पारिश्रमिक ऐंठकर अपनी बैंक बचत बढ़ा लेते हैं।
उधर क्रिकेटर रत्न सचिन हों या कैप्टन धोनी या अन्य खेलवीर-हमारे ये सभी मनोरंजनकारी सेलिब्रिटी लाखों-करोड़ों बना ही रहे हैं इस विज्ञापनबाजी में।
सुप्रसिद्ध-पुरस्कृत लेखक पैसा बटोरने के इस चांस से वंचित क्यों है? इन लेखकों को न लाखों पाठक नसीब हैं और न ही लाखों की रॉयल्टी। इन्हें टीवी चैनल वाले अपनी आमदनी का हिस्सेदार क्यों नहीं बनाते? क्या हिंदी साहित्य के बूढ़े और युवा लेखकों में प्रतिभा का अभाव है? हर साल हजारों किस्म की किताबें पुस्तक मेलों में बिकने को प्रदर्शित होती हैं। इनके लेखकों में लोकप्रिय कवि हैं, कथाकार हैं, विद्वान आलोचक प्रोफेसर, वक्ता हैं, संपादक हैं। विज्ञापनबाजी के इस युग में इन हिंदी लेखकों को पर्दे पर ऐड का ब्रेक नहीं दिया जाना चाहिए क्या?
हिंदी में बेचारे पुरोहितनुमा लेखक पुस्तक-लोकार्पणों में हाथ आजमा रहे हैं या सभा-सम्मेलनों में कुछ वक्त के लिए अध्यक्षता का आसन अपनाकर अभिभूत हुए जाते हैं। धन-दौलत की जरूरत इन्हें भी रहती है। ये दीर्घायु पाकर बुढ़ापे वाली बीमारियों-कमजोरियों तथा अकेलेपन को झेल रहे हैं। उपचार और मनबहलाव के वास्ते इन हस्तियों को विज्ञापनों का ब्रेक जरूरी नहीं है क्या?