राजधानी दिल्ली में इन दिनों एक अजीब-सी बेचैनी महसूस होती है हर जगह। सरकारी दफ्तरों में जाती हूं, तो ऐसा लगता है, जैसे आला अफसर और छोटे मुलाजिम कामकाज छोड़कर कहीं जाने की तैयारी कर रहे हों। किसी मंत्री से मिलने जाती हूं, तो यही माहौल दिखता है। सवाल करती हूं मैं किसी राजनीतिक मुद्दे पर, तो बेचैन होकर मंत्री मेरी तरफ देखते हैं और कहते हैं स्पष्ट शब्दों में, कि अब जो होगा चुनाव के बाद ही होगा। फिर पूछते हैं इधर-उधर झांककर, कितनी सीटें दे रही हो आप कांग्रेस को? जवाब मेरा अक्सर होता है कि मैं राजनीतिक ज्योतिषी तो हूं नहीं, लेकिन सुनती हूं कांग्रेसियों से ही कि इस बार हाल अच्छा नहीं है। मंत्री जी के चेहरे पर एक गंभीर उदासी छा जाती है और माहौल में पहले से जो बेचैनियां हैं, वे और बढ़ जाती हैं। सरकारें आती हैं, जाती हैं, लेकिन इस बार ऐसा लगने लगा है, जैसे एक युग के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं हम सब।
वह इसलिए कि राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार अगर कांग्रेस हारती है, तो अंत हो जाएगा नेहरू-गांधी परिवार का राज। पहले भी लोकसभा के चुनाव हार चुकी है कांग्रेस। इंदिरा गांधी के समय हार का सामना करना पड़ा 1977 में। राजीव गांधी के समय हार का सामना करना पड़ा 1989 में, और सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की लोकसभा में सबसे कम सीटें हासिल हुई थीं 1999 में। लेकिन कभी पहले नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल ऐसे नहीं उठे थे, जैसे अब उठ रहे हैं। ऊपर-ऊपर से तो सब ठीक दिखता है इस बार भी। राहुल गांधी का चेहरा बन चुका है कांग्रेस के प्रचार की सबसे अहम निशानी। टीवी पर राजीव आवास योजना के गुण गाए जा रहे हैं...मकान होगा सबका, घर-घर में पानी मिलेगा इत्यादि-इत्यादि। अखबार खोलो, तो नजर आता है सोनिया गांधी का चमकता चेहरा उन इश्तहारों में, जिनमें गिनाई जाती हैं यूपीए सरकार की उपलिब्धयां। अंदर की बात, कुछ और है।
ऐसा नहीं है कि चुनाव अगर कांग्रेस हार जाती है, तो राहुल गांधी को हटाकर पार्टी की बागडोर किसी और के हाथों में थमा दी जाएगी। राहुल गांधी को हटाने का सवाल ही नहीं उठ सकता, लेकिन कहा जा रहा है कि इस बार अगर हारती है कांग्रेस, तो दोबारा राज करने का मौका इतने दिनों बाद आएगा कि राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना तकरीबन नामुमकिन हो जाएगा। देश बदल गया है। राज्यों से उभर कर आ रहे हैं प्रधानमंत्री पद के दावेदार, और मुख्यमंत्री इतने ताकतवर हो गए हैं अब कि हाई कमान जैसे शब्द पुराने हो गए हैं। यह सही है कि ऐसा बदलाव अभी तक कांग्रेस में नहीं आया है। लेकिन जब आंध्र प्रदेश में ऐसा करना चाहा, तो शुरू हो गई थी जगन मोहन की क्रांति। तेलंगाना के बनने के बाद इस्तीफा दे दिया उस राज्य के मुख्यमंत्री ने। नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व को इस तरह की चुनौती पुराने जमाने में कोई दे सकता था क्या?
इसी आंध्र प्रदेश में राजीव गांधी की ताबेदारी करने वाले मुख्यमंत्री की याद है आपको? राजीव गांधी ने जब उनको सबके सामने डांटा था, तो उस डांट से पैदा हुए थे एनटी रामा राव, जिन्होंने अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था आंध्र के उस अपमान को मुद्दा बनाकर। आज हाल यह है कि जगन रेड्डी जंतर-मंतर पर बैठकर पत्रकारों के सामने बातें करते हैं सोनिया गांधी के विदेशी होने की।
जैसे-जैसे पराजय के आसार दिखने शुरू हो गए हैं चुनावी क्षितिज पर, कांग्रेस पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के तेवर भी बदलते दिखने शुरू हो गए हैं। जिनके मुंह से कभी आलोचना का एक शब्द नहीं निकलता था गांधी परिवार के लिए, आजकल वे खुलकर बोलते हैं कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कमियां हैं, इसलिए कांग्रेस को चुनौती दे सकते हैं नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल जैसे लोग। चुनौतियां इतनी हैं देश की इस सबसे पुरानी राजनीतिक दल के सामने कि आजकल उनके अति वफादार सरकारी अधिकारी भी तैयारी कर रहे हैं बदलाव की। यह बदलाव कैसा होगा, अभी कहा नहीं जा सकता, लेकिन किसी को कोई शक नहीं रहा है कि बदलाव आने वाला है ऐसा कि भारत की राजनीतिक तस्वीर के सारे रंग बदल सकते हैं।