ट्रंप के साथ बहस में खराब प्रदर्शन के बाद उन पर डेमोक्रेटिक दानदाताओं, कांग्रेसियों और सीनेटरों द्वारा उम्मीदवारी छोड़ने का दबाव बढ़ने लगा था। यह बात दुखद है कि बाइडन ने संकेतों पर ध्यान न देते हुए दूसरे कार्यकाल के बारे में सोचा। सर्वेक्षणों में भी उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी से पिछड़ते हुए दिखाया गया था, हालांकि बाइडन ने कई सप्ताह तक कड़ी मेहनत की, जब तक कि उन्हें उम्मीदवारी छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ा।
अपने पद से चिपके रहने की मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति की हताशा व्यक्तिगत नहीं थी। यह एक संकेत है कि हर देश में सत्ता का सुख भोगने वाले और व्यावसायिक तौर पर सफल व्यक्ति किस तरह से व्यवहार करते हैं। यहां तक कि उस समय भी, जब वे शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो गए हों। ऐसे में ये लोग उन संस्थानों, समाज को नुकसान पहुंचाने लगते हैं, जिनकी वे सेवा करते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में क्रिकेट के प्रशंसक इस तरह की घटनाओं से भली-भांति अवगत हो सकते हैं। जब कोई खिलाड़ी पैंतीस साल से ऊपर होता है तो उसके लिए पहले जैसा प्रदर्शन कर पाना मुश्किल होता है। उनमें से कुछ ही इन संकेतों को पहचान पाते हैं। सुनील गावस्कर इसके एक अपवाद हैं, जिन्होंने विश्व कप में शानदार बैटिंग करने के बाद खेल छोड़ दिया था। उनके सबसे अच्छे साथी गुंडप्पा विश्वनाथ को सही मायनों में बहुत पहले सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए था। कपिल देव और सचिन तेंदुलकर भी काफी लंबे समय तक खेलते रहे। देखा जाए तो हर मामले में, चाहे वह सर्वाधिक टेस्ट विकेट लेने का हो या सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने का, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को टीम से ऊपर रखा गया। युवाओं को आगे बढ़ने देने के बजाय यह जो शीर्ष पर रहते हुए शक्ति का उपयोग करने की इच्छा है, यह खेल और राजनीति के बहुत आगे है। हमारे बहुत से उद्यमियों ने अपने द्वारा स्थापित निकायों को निर्देशित कर अपने पिछले योगदानों को कम कर दिया, जबकि उन्हें अपने से अधिक सक्षम युवाओं को यह मौका देना चाहिए था। हर कीमत पर लंबे समय तक शीर्ष पर बने रहने की इच्छा दुनियाभर में पाई जाती है।
इस तरह की इच्छा बौद्धिक जीवन को भी प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, मुंबई से प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा वाली पत्रिका ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ (ईपीडब्ल्यू) को ले सकते हैं। यह एक ऐसी पत्रिका थी, जिसे भारत और दुनिया का हर विद्वान पढ़ने और छापने के लिए उत्सुक रहता था। पत्रकारों, नौकरशाहों और कार्यकर्ताओं ने भी ईपीडब्ल्यू में उतनी ही दिलचस्पी दिखाई, जितनी कि विद्वानों और शोधकर्ताओं ने। फिर भी हाल के कुछ सालों में पत्रिका की साख में गिरावट आई है। कभी भारतीय नेताओं की बहस का विषय तय करने वाली पत्रिका में अब कुछ ही अवसरों पर सार्थक और सशक्त निबंध छपते हैं। यह अब अपने पूर्व स्वरूप की धुंधली छाया बनकर रह गई है।
ईपीडब्ल्यू में आई गिरावट दूसरे बौद्धिक संस्थान बेंगलुरु के राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र (एनसीबीएस) के स्व-नवीनीकरण के बिल्कुल विपरीत है, जिससे मैं परिचित हूं। एनसीबीएस टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की एक शाखा है, जिसकी स्थापना 1940 के दशक में मुंबई में की गई थी। अपने पहले डेढ़ दशक में इस शाखा पर भौतिक वैज्ञानिकों और गणितज्ञों का वर्चस्व रहा। हालांकि 1960 के दशक में इस शाखा ने एक प्रतिभाशाली युवा जीव विज्ञानी ओबैद सिद्दीकी को भर्ती किया, जिन्होंने 20 साल तक शाखा के मुख्य परिसर में अपनी सेवाएं दीं और वह एक नया जैविक अनुसंधान केंद्र की स्थापना करने के लिए बेंगलुरु चले गए।
एनसीबीएस के बारे में मुझे सबसे अच्छी बात लगती है कि यह किसी भी भारतीय शैक्षणिक संस्थान की तुलना में सबसे कम पदानुक्रमित संस्थान है। यह कॉलेजियम और खुले बौद्धिक आदान-प्रदान की भावना से भरा हुआ है, जो वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान करने वाले ज्यादातर केंद्रों में नहीं है। आईआईटी में तो यह बिल्कुल नहीं है। यहां निदेशक अपने युवा सहकर्मियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं, जो उनसे ज्यादा बेहतर शोध कर सकते हैं।
ओबैद सिद्दीकी को बेहद करीब से देखने के बाद मेरे मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं रह गया कि उन्होंने इस लोकतांत्रिक और भागीदारी वाले लोकाचार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जैसे ही निदेशक के तौर पर ओबैद सिद्दीकी का कार्यकाल पूरा हुआ, वे एनसीबीएस की डोर युवा हाथों में सौंपकर अपने शोध से जुड़ गए। अगर ओबैद सिद्दीकी प्रतिभावान नहीं होते तो शायद एनसीबीएस इतना फल-फूल नहीं पाता। किसी भी संस्था की स्थायी सफलता का एक अन्य कारण उसके द्वारा अपनाई गई शासन व्यवस्था की संरचना है। एनसीबीएस बोर्ड के सदस्य का कार्यकाल ठीक तीन साल का होता है। इसे एक या दो बार नवीनीकृत किया जा सकता है, लेकिन इससे अधिक नहीं। ईपीडब्ल्यू चलाने वाले ट्रस्ट के विपरीत यहां कोई भी ‘आजीवन’ सदस्य नहीं रह सकता। एनसीबीएस बोर्ड में सेवा देने के लिए किसी व्यक्ति की अधिकतम अवधि नौ वर्ष है, जबकि ईपीडब्ल्यू के बोर्ड में कुछ ट्रस्टी तीस वर्षों से कार्यरत हैं।
निष्कर्ष के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि लंबे समय तक अपने पद पर बने रहने की चाहत महिलाओं से ज्यादा पुरुषों में देखी जाती है। ओबैद सिद्दीकी इसके अपवाद रहे हैं। राजनीति, खेल, व्यवसाय और शिक्षा के क्षेत्र में अनगिनत भारतीय पुरुषों ने ऐसे काम किए हैं और आगे भी करते रहेंगे, जैसा कि वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति करना चाहते थे। इस तरह के अदूरदर्शी और आत्मकेंद्रित व्यवहार की कीमत अधिक प्रतिभाशाली कनिष्ठ सहयोगियों और समग्र रूप से समाज को चुकानी पड़ती है।