पुरुरवस ने कहा, ‘उर्वशी! मैं तुम्हारे सौंदर्य पर मुग्ध हूं, इसलिए तुमसे विवाह करना चाहता हूं। मैं तुम्हें सदा सुखी रखने का वचन देता हूं।’
उर्वशी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘संभव है कि आपका वचन भी आपके संयम की तरह किसी दिन टूट जाए। अत: यदि आप मुझसे विवाह करना चाहते हैं, तो मेरी तीन शर्तें हैं। आपने किसी भी शर्त का उल्लंघन किया, तो मैं आपको छोड़कर देवलोक चली जाऊंगी।’
‘मुझे स्वीकार है। बताओ, तुम्हारी क्या शर्त है?’ पुरुरवस ने पूछा। उर्वशी बोली, ‘पहली शर्त यह है कि मेरे पास दो मेढ़े हैं, जिन्हें मैंने बच्चों की तरह पाला है। आपको उनकी रक्षा करनी होगी। दूसरी शर्त है कि मैं केवल घी का सेवन करती हूं, इसलिए मुझे किसी अन्य वस्तु के सेवन के लिए बाध्य नहीं करेंगे। तीसरी और अंतिम शर्त यह है कि संभोग के अतिरिक्त आप निर्वस्त्र अवस्था में मेरे समक्ष नहीं आएंगे।’
उर्वशी की तीनों शर्तें अटपटी थीं, किंतु उन्हें पूरा करना कठिन नहीं था। पुरुरवस ने तुरंत उर्वशी की शर्तें स्वीकार कर लीं और उससे विवाह कर लिया।
उर्वशी, नृत्य और संगीत में पारंगत थी। पुरुरवस ने भी उर्वशी के साथ रहते हुए नृत्य और संगीत का ज्ञान अर्जित कर लिया। एक दिन पुरुरवस को इंद्र की ओर से देवलोक में नृत्य-संगीत के कार्यक्रम का निमंत्रण मिला। इंद्र की सभा में पुरुरवस ने नृत्य में कुछ कमी बताई, तो तुंबरू नामक एक गंधर्व पुरुरवस से रुष्ट हो गया। उसने पुरुरवस को शाप दिया कि उसे शीघ्र उर्वशी से अलग होना पड़ेगा।
उर्वशी तो पुरुरवस के साथ प्रसन्न थी, किंतु इंद्र को अपनी सभा में उर्वशी की कमी खलती थी। अत: उन्होंने गंधर्वों के साथ मिलकर उर्वशी को वापस देवलोक बुलाने के लिए चाल चली...
एक दिन अर्धरात्रि के समय, उर्वशी और पुरुरवस रति-क्रीड़ा में मग्न थे। तभी इंद्र के कहने पर कुछ गंधर्व, पुरुरवस के महल में घुस गए। उन्होंने उर्वशी के दोनों प्रिय मेढ़े चुरा लिए और उन्हें लेकर महल से भाग निकले। रात्रि के अंधकार में सहसा हुए हमले से मेढ़े घबरा गए और चिल्लाने लगे। मेढ़ों के चिल्लाने की आवाज सुनकर उर्वशी को चिंता हुई। उसने पुरुरवस से कहा, ‘महाराज! मेरे दोनों मेढ़े चिल्ला रहे हैं। वे संकट में हैं। मेरी शर्त थी कि आपको मेढ़ों की रक्षा करनी है। इसलिए तुरंत जाइए और उन्हें संकट से बचाइए!’ शर्त वाली बात सुनकर पुरुरवस हड़बड़ा गया। संभोग-क्रिया में रत होने के कारण पुरुरवस उस समय निर्वस्त्र था। जल्दबाजी में उसे उर्वशी की दूसरी शर्त याद नहीं रही और वह मेढ़ों को बचाने के लिए बिस्तर से निर्वस्त्र हालत में निकलकर मेढ़ों के पीछे भागा। इसी बीच, इंद्र के संकेत पर आकाश में जोरदार बिजली चमकी और उस तेज प्रकाश में उर्वशी ने पुरुरवस को निर्वस्त्र देख लिया। संभोग के अलावा किसी अन्य समय पर पुरुरवस को निर्वस्त्र देखने के कारण उर्वशी की शर्त भंग हो चुकी थी। उसका अब देवलोक लौट जाना निश्चित था। यहां तक कि उर्वशी ने पुरुरवस के वापस आने की भी प्रतीक्षा नहीं की और उसे छोड़कर देवलोक चली गई। इंद्र की युक्ति सफल हो गई और गंधर्व तुंबरू का शाप भी फलीभूत हो गया। आखिर पुरुरवस को उर्वशी से अलग होना पड़ा। उर्वशी के जाने से पुरुरवस अत्यंत दुखी था। कुछ समय बाद वह बद्रिकाश्रम चला गया, जहां उसने भगवान विष्णु की आराधना की। विष्णु ने प्रसन्न होकर पुरुरवस को वरदान में उर्वशी के साथ वर्ष में एक बार मिलने की अनुमति प्रदान कर दी। कालांतर में उर्वशी और पुरुरवस के मिलन के फलस्वरूप उनके छह पुत्र हुए-आयुष, श्रुतायुष, सत्यायुष, रय, विजय और जय।