केंद्र भी कई बार इस बारे में एडवाइजरी जारी कर चुका है, लेकिन ऐसा लगता है कि चैनलों ने न सुधरने की जिद ठान ली है। किक्रेटर ऋषभ पंत की सड़क दुर्घटना के फोटो बिना ब्लर किए हुए दिखाना, एक पंजाबी गायक के खून से सने हुए चेहरे का क्लोज शॉट टीवी पर बार—बार दिखाना या पटना की एक कोचिंग में पांच साल के बच्चे की टीचर द्वारा की गई पिटाई के चित्र दिखाना। ये घटनाएं सिर्फ एक बात का इशारा करती हैं कि टीवी चैनलों ने प्रोग्राम कोड को या तो ताक पर रख दिया है या फिर ये तय कर लिया है कि जब तक उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं होगी, वे नहीं सुधरेंगे।
बता दें कि 1994 में बनाए गए केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम के नियम पांच में प्रोग्राम कोड और नियम छह में विज्ञापन कोड का जिक्र किया गया है। नियम पांच के मुताबिक, टीवी पर ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाना चाहिए, जो शालीनता के विरुद्ध हो, जिसमें मित्र देशों की आलोचना हो। ऐसे कार्यक्रम दिखाना मना है, जिनमें अश्लील, मानहानिकारक, जानबूझकर झूठा और विचारोत्तेजक संकेत और आधा सच शामिल हो और जो व्यक्तिगत रूप से या देश के सामाजिक, सार्वजनिक और नैतिक क्षेत्रों में किसी व्यक्ति या कुछ समूहों की आलोचना या बदनामी करता हो।
प्रोग्राम कोड में अभद्र भाषा और हिंसक दृश्यों के उपयोग की भी रोक है। इन नियमों में कई बार संशोधन किए गए हैं। 2015 में हुए संशोधन में कहा गया कि कोई टीवी चैनल किसी आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई का सीधा प्रसारण नहीं कर सकता और सिर्फ किसी सक्षम अधिकारी की मीडिया ब्रीफिंग को दिखा सकता है। इसी तरह 2016 में एक बार फिर कार्यक्रम कोड में एक उपनियम जोड़कर पशुओं के प्रति क्रूरता या हिंसा या किसी ऐसे अवैज्ञानिक विश्वास को प्रोत्साहित करना, जो पशु के लिए हानिकारक हो, पर रोक लगाई गई।
कानूनी रूप से केंद्र सरकार के पास ऐसी ताकत है कि वह प्रोग्राम कोड के उल्लंघन के लिए किसी भी चैनल के प्रसारण पर रोक लगा दे। बावजूद इसके सरकार सिर्फ परामर्श जारी करती है, क्योंकि सरकार स्व-नियामक यानी सेल्फ रेग्यूलेशन के मॉडल को लागू करना चाहती है। पिछले साल भी केंद्र सरकार ने एक परामर्श जारी करके निजी टीवी चैनलों पर रूस-यूक्रेन युद्ध की रिपोर्टिंग के दौरान अप्रामाणिक, भ्रामक, सनसनीखेज और सामाजिक रूप से अस्वीकार्य भाषा और टिप्पणियों के उपयोग पर आपत्ति जताई थी। इस परामर्श में कुछ चैनलों पर उत्तर-पश्चिमी दिल्ली की घटनाओं की रिपोर्टिंग करते समय बिना जांचे सीसीटीवी फुटेज चलाकर दर्शकों को भड़काने के इरादे से निंदनीय सुर्खियां, मनगढ़ंत और अतिशयोक्तिपूर्ण बयानों के इस्तेमाल के लिए भी लताड़ा था और चैनलों को कार्यक्रम और विज्ञापन कोड का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
हेट स्पीच से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हेट स्पीच या तो मेनस्ट्रीम टेलीविजन पर नजर आ रही है या सोशल मीडिया पर। अदालत ने कड़े शब्दों में चैनलों के एंकरों को फटकार लगाई थी। शीर्ष अदालत की चिंता जायज थी। नफरती बहसों का जहरीला कारोबार हर हाल में बंद होना चाहिए। प्रेस की आजादी अहम है, लेकिन बिना रेग्यूलेशन के टीवी चैनल हेट स्पीच का जरिया बन गए हैं और अक्सर सुरुचि और स्वतंत्रता का दायरा पार कर जाते हैं। टीवी चैनलों को अपनी गिद्ध दृष्टि के लिए अपराध, हिंसा और मौत के समाचारों में खून-खराबा दिखाने की और टीआरपी बढ़ाने के लिए खबरों को सनसनीखेज बनाकर समाज में विभाजन पैदा करने की छूट कतई नहीं दी जा सकती।
-क्षेत्रीय निदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान, जम्मू।