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पाकिस्तान को काली सूची में कौन डालेगा

आनंद कुमार Published by: Raman Singh Updated Sun, 23 Feb 2020 06:35 PM IST
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एफएटीएफ बैठक - फोटो : a

जून, 2018 से ही फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची में शामिल पाकिस्तान एक बार फिर दंड से बच गया है। आतंकवाद का वित्तपोषण या मनी लॉन्डरिंग के खिलाफ कोई महत्वपूर्ण कार्रवाई न करने के बावजूद एफएटीएफ ने पाकिस्तान को काली सूची में नहीं डाला। अपना कार्ड अच्छी तरह खेलते हुए पाकिस्तान ने संभवतः दूसरे सदस्यों को बताया कि इस मुद्दे पर अपनी आंखें बंद रखने से उन्हें ज्यादा लाभ मिलेगा। जबकि कुछ दूसरे देशों ने सीधे-सीधे धार्मिक आधार पर पाकिस्तान का बचाव किया।



एफएटीएफ पेरिस स्थित एक अंतरसरकारी निकाय है, जिसका गठन 1989 में मनी लॉन्डरिंग पर अंकुश लगाने के लिए किया गया था। लेकिन 9/11 की आतंकी घटना के बाद आतंकी वित्तपोषण पर अंकुश लगाने के लिए भी इसके कार्य क्षेत्र को बढ़ा दिया गया। इस निकाय के 39 सदस्य हैं और यह संगठन निश्चित आधार पर सदस्य देशों के आचरण पर फैसला करता है। किसी भी देश को ग्रे सूची से हटाने के लिए 12 देशों के समर्थन की जरूरत होती है, जबकि मात्र तीन देशों के समर्थन से ही किसी देश को काली सूची में डालने से रोका जा सकता है। एफएटीएफ सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश को 'कॉल फॉर ऐक्शन' की श्रेणी में रखता है।


लगातार ग्रे सूची में होने के बावजूद पाकिस्तान का आचरण सुधरा नहीं है। लश्कर और जैश जैसे आतंकी संगठन लगातार भारत के खिलाफ आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्त है। आतंकवाद से प्रभावित भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गुहार लगाई है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था को पाकिस्तान जैसे देशों के खिलाफ, जो आतंकी गुटों का प्रायोजक है, कार्रवाई करने के मामले में तटस्थ होना चाहिए।  संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने 20 नवंबर, 2019 को अपराध-आतंक की सांठगांठ के वैश्विक खतरे से निपटने के लिए बिना किसी दोहरे मापदंड के शून्य सहिष्णुता के दृष्टिकोण का आह्वान किया था।


यहां तक कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए पाकिस्तान को फटकार लगाई है। उसने अपने मूल्यांकन में क्षेत्रीय आतंकी गुट को खतरा बताया है। उसने पाकिस्तान सरकार पर लश्कर और जैश को पाकिस्तान में धन जुटाने, भर्ती करने और प्रशिक्षण देने से रोकने में विफल रहने तथा जुलाई, 2018 का आम चुनाव लड़ने के लिए लश्कर से जुड़े उम्मीदवारों को अनुमति देने का आरोप लगाया।


इस आकलन के बावजूद अमेरिका एक खास बिंदु से आगे नहीं बढ़ा है। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि वह अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुला लेंगे। हालांकि इस प्रयास में वह अब तक सफल नहीं हुए हैं। अमेरिका ने दोहा में तालिबान के साथ शांति वार्ता की, लेकिन उसके वांछित परिणाम नहीं मिले। अमेरिका अब भी पाकिस्तान पर उम्मीद लगाए बैठा है (जहां से तालिबान का शीर्ष नेतृत्व काम करता है) कि तालिबान के साथ शांति वार्ता में वह मध्यस्थता करेगा, और जो उसकी सेना को लौटने और इतिहास के सबसे लंबे युद्ध को खत्म करने की अनुमति देगा। अगर पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया जाता है, तो उसका व्यवहार शत्रुतापूर्ण होने की आशंका रहेगी और तालिबान के साथ शांति वार्ता में वह सहयोग नहीं करेगा।


हाल ही में जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव जनरल एंटोनियो गुटेरस अफगान शरणार्थियों पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान पहुंचे थे, तब उन्होंने अफगान शरणार्थियों की मेजबानी में पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की, लेकिन उन्होंने इसका पूरा ध्यान रखा कि आतंक पैदा करने में हक्कानी नेटवर्क की भूमिका की ओर इंगित न किया जाए। उन्होंने ट्रंप की तरह कश्मीर मामले में मध्यस्थता की पेशकश कर पाकिस्तान को खुश करने की कोशिश की। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को डर है कि अगर पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया गया, तो पहले से ही बदहाल उसकी अर्थव्यवस्था और खराब हो जाएगी। यह पाकिस्तान के खात्मे का कारण बन सकता है, जिसके चलते दुनिया और उसके पड़ोसियों के लिए परेशानी पैदा हो सकती है।


पाकिस्तान ने भी मुस्लिम जगत की राजनीति को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की। हाल के दिनों में खाड़ी में हालात अस्थिर रहे हैं। सऊदी अरब का राजनीतिक प्रभाव कम हुआ है और ईरान का कद बढ़ा है। ऐसे माहौल में तुर्की मुस्लिम जगत का नया नेता बनकर उभर रहा है। इस उद्देश्य के साथ कुआलालंपुर में एक शिखर बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें पाकिस्तान को भी बुलाया गया था। लेकिन पाकिस्तान ने अंतिम क्षण में उसमें जाने से इन्कार कर दिया, जब सऊदी अरब ने उसके चालीस लाख नागरिकों को वापस भेजने और पाकिस्तानी बैंकों में रखे अरबों डॉलर निकालने की धमकी दी। बाद में इमरान खान ने मलयेशिया का दौरा कर उसे खुश करने की कोशिश की, और तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया। तुर्की और पाकिस्तान के बीच मजबूत रक्षा भागीदारी भी है। एर्दोगन एफएटीएफ की बैठक से ठीक पहले पाकिस्तान गए और खुलेआम पाकिस्तान को काली सूची में जाने से बचाने का उन्होंने वादा किया।
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पाकिस्तान ने कुछ दिखावटी उपाय भी किए, जैसा कि वह एफएटीएफ की हर पूर्ण बैठक से पहले करता है। उसने आतंकी फंडिंग के आरोप में हाफिज सईद को गिरफ्तार किया और कहा कि एक और आतंकी सरगना मसूद अजहर लापता है। हालांकि भारत ने मसूद अजहर के पाकिस्तान में होने के सबूत दिए।


पाकिस्तान को काली सूची से बाहर रहने के लिए तीन देशों के समर्थन की जरूरत थी। ये तीन वोट उसने तुर्की, मलयेशिया और चीन की मदद से आसानी से हासिल कर लिए। इसके अलावा, चीन अभी एफएटीएफ का नेतृत्व कर रहा है। इसमें शायद अमेरिका की भी मौन सहमति थी, जो उम्मीद कर रहा है कि अफगानिस्तान से निकलने में पाकिस्तान मदद कर सकता है। ऐसा होगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा। फिलहाल कुछ समय के लिए पाकिस्तान को वह मिल गया है, जिसकी उसे तलाश थी।


-लेखक मनोहर पारिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस में एसोसिएट फेलो हैं।

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