दो मित्र नदी के किनारे खेल रहे थे। एक ने कहा, यहां तो रेत है, पानी क्यों नहीं है? दूसरे ने कहा, पानी हमेशा ऊपर नहीं रहता। फिर दोनों मिलकर रेत की खुदाई करने लगे। कुछ देर में पानी नजर आने लगा।
सत और असत क्या है, यह एक सनातन जिज्ञासा है। इस बारे में विचार को सद-असद विवेक कहते हैं। लौकिक भाषा में सत का अर्थ है, अच्छा। आध्यात्मिक अर्थ है, अपरिणामी, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। जो असत है, वह परिणामी है, यानी उसमें अवस्था बदलती है। सत एक ही है, बाकी जितनी वस्तुएं हैं, सब असत हैं। असत वस्तु का अर्थ खराब नहीं, परिवर्तनशील है।
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किसी भी वस्तु में जब देश, काल अथवा पात्र का भेद आ जाता है, तब वह परिवर्तित हो जाता है। वह अपने पहले वाले रूप में नहीं रहता। हम लोग दुनिया में बहुत कुछ पाते हैं, जो ऐसा ही है, जैसे दही में घी है। मगर घी पाने के लिए दही को मथना होगा। मंथन करना पड़ेगा। तब एक तरफ मक्खन अलग हो जाएगा। गर्मी के समय में नदी में पानी नजर नहीं आता, केवल बालू नजर आती है। लेकिन ऐसा नहीं होता।
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बालू को हाथ से हटाकर देखो, नीचे पानी नजर आएगा। वहां अंतर्निहित जलधारा है। ठीक वैसे ही हमारे अंदर परमात्मा छिपे हैं। अपने मन वाले तिल को पीसकर खली अलग कर दो, तो तेल मिल जाएगा। मन की अपवित्रताएं, पाप, संकीर्णताएं, गुनाह- सभी हटा दो।
यह भक्तिमूलक साधना है, जिसमें है, मैं और मेरा ईश्वर। यही सही उपाय है और इसे लेकर जो आगे चलते, वे ही परम पिता को पाएंगे। यह वही कर सकता है, जो दूसरों के दुख समझता ही नहीं, उसे दूर करने की कोशिश भी करता है। हिम्मत के साथ भक्ति का बहुत निकट संबंध है। जो पापी है, वही डरपोक है।