बचपन में हममें से ज्यादातर उन औपन्यासिक किरदारों को बहुत पसंद करते थे, जिनमें अतिमानवीय शक्तियां हों। बीती सदी के साठ के दशक में इंद्रजाल कॉमिक्स के जरिये बहुतेरे पश्चिमी, खासकर अमेरिकी हास्य चरित्र अंग्रेजी बोलने वाले मध्यवर्गीय भारतीय बच्चों के बीच आए। फैंटम, सुपरमैन, बैटमैन, मैंड्रेक और फ्लैश गॉर्डन जैसे किरदार ऐसे बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय बन गए। भारतीय पाठकों के लिए ये किरदार जाने-पहचाने थे, क्योंकि इन कॉमिक्सों के आने से पहले ये किरदार भारतीय अखबारों के कॉमिक स्ट्रिप्स में दिखते रहे थे। इंद्रजाल कॉमिक्स की सफलता देखकर, और यह भांपकर कि आने वाले दिनों में ऐसी सचित्र किताबों का भारतीय भाषाओं में बाजार बढ़ेगा, अमर चित्र कथा की शुरुआत की गई और यह बेहद सफल हुई। बाटुल द ग्रेट, चाचा चौधरी, सुपर कमांडो ध्रुव और डिटेक्टिव मूंछवाला जैसे किरदार न सिर्फ गढ़े गए, बल्कि समय के साथ किरदारों में बदलाव भी लाए गए-मसलन, आतंकवादी घटनाओं और कमांडो बल की शुरुआत के साथ कमांडो जैसा किरदार गढ़ा गया।
भारतीय सिनेमा भी समय के साथ अपने सामाजिक संदेशों से आगे बढ़ा। अनेक फिल्में तो सुखांत परीकथाओं जैसी बनीं। भारतीय सिनेमा के नायकों को अविश्वसनीय स्टंट करते देखने के हम अभ्यस्त हो चुके हैं। पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म, तेवर, में अर्जुन कपूर एक गीत गाते हुए खुद को सुपरमैन बताता है। सिलवेस्टर स्टैलोन ने रैम्बो की भूमिका निभाते हुए इसकी एक संस्कृति गढ़ दी थी, जिसके कई भारतीय संस्करण हैं। रैम्बो सीरीज की फिल्मों के प्रशंसक भी हैं, और अगर इन्हें शालीनता के मानकों और कानूनी संदर्भों में देखा जाए, तो शायद ही कोई आलोचक इन फिल्मों की आलोचना कर पाएगा।
लेकिन इस तरह की हैरतअंगेज फिल्में अगर धर्म के आवरण में लिपटी हों, तो बात दूसरी हो जाएगी। अगर ऐसी फिल्मों का नायक पेशेवर अभिनेता होने के बजाय स्वघोषित 'रॉक स्टार संत' हो, तो मामला और भी जटिल हो जाता है। हमारे यहां धर्म का उपयोग कई बार खुद को व्यावसायिक दृष्टि से सफल बनाने और अनुयायियों की लंबी कतार खड़ी करने के लिए भी किया जाता है। इनमें से कई धर्मगुरु टेलीविजन की दुनिया में भी सक्रिय हैं। अगर हम गूगल पर सर्च करें, तो धर्म से जुड़े अनेक बाबाओं और माताओं को पाएंगे।
पर मैसेंजर ऑफ गॉड के साथ ही हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। अब तक कई धर्मगुरुओं के जीवन पर फिल्में बनी हैं, पर यह पहली बार है, जब कोई धर्मगुरु खुद पर्दे पर नायकोचित करतब दिखाता या धर्मोपदेश देता देखा जाएगा। मैंने इस फिल्म के प्रोमो देखे हैं, जो अपने गानों के कारण भी विवाद में है। हालांकि मैं इस तरह की मार-धाड़ वाली फिल्मों का फैन नहीं हूं, लेकिन ऐसी टाइम-पास फिल्मों में तब भी परिवार या मित्रों के साथ जाने की सोच सकता हूं, जब सलमान खान, अक्षय कुमार या अर्जुन कपूर जैसे हीरो हों।
लेकिन एमएसजी के साथ जो विवाद शुरू हुआ है, वह दूसरे किस्म का है-चूंकि धर्मगुरु गुरमीत सिंह राम रहीम अतीत में कई बार विवाद की वजह बने हैं, और यह फिल्म पंजाब में अशांति का कारण बन सकती है, इसलिए स्वाभाविक ही सेंसर बोर्ड ने इसे हरी झंडी नहीं दिखाई। पर सेंसर बोर्ड के पैनल की आपत्तियों को खारिज करते हुए अपीलीय प्राधिकरण ने इस फिल्म को हरी झंडी दिखाई, जिसके विरोध में बोर्ड की मुखिया लीला सैमसन समेत कई अन्य लोगों ने अपने इस्तीफे सौंपे।
एनडीए सरकार का कहना है कि उसने सेंसर बोर्ड की स्वायत्तता पर अंकुश नहीं लगाया है, लेकिन सत्ता में आने के बाद से इस सरकार ने शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी कई स्वायत्त संस्थाओं के पर जिस तरह कतरे हैं, उसे देखते हुए सरकार की निर्दोषिता के दावे पर विश्वास करना कठिन है। हाल के महीनों में कई क्षेत्रों में देश के संवेदनशील ताना-बाना पर हमला किया गया है, और यह लीला सैमसन पर की गई इस ओछी टिप्पणी में भी झलकता है कि एक नाचने वाली को क्या पता कि कौन-सी फिल्म दिखाई जानी चाहिए।
सेंसर बोर्ड का गठन 1920 में भारतीय सिनेमैटोग्राफिक ऐक्ट के तहत हुआ। इसके गठन के पीछे उद्देश्य यह था कि यह लोकप्रिय मीडिया राष्ट्रीय भावना का मंच न बने। इसे पुलिस के नियंत्रण में रखा गया। जहां इस तरह के दूसरे उद्योग स्व नियंत्रण के तहत चलते हैं, वहीं फिल्मों को सर्टिफिकेट दिए जाते हैं। मैसेंजर ऑफ गॉड पहली फिल्म नहीं है, जिसने सेंसर बोर्ड में तूफान खड़ा कर दिया है। हाल के वर्षों में कई फिल्मों के कारण विवाद पैदा हुए हैं। विगत मई में बोर्ड के सीईओ को रिश्वतखोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तब आरोप यह लगे थे कि फिल्मों को हरी झंडी देने के बदले में पैसे लिए गए। बोर्ड के साथ मुश्किल यह है कि इसका जिस तरह का ढांचा है, उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप के साथ व्यावसायिक लाभ उठाने की भरपूर आशंकाएं हैं। लीला सैमसन के मुताबिक, इस संस्था को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं है, और फिल्म उद्योग को भी इस पर भरोसा नहीं है। इसीलिए उन्होंने सेंसर बोर्ड के पुनर्गठन की जरूरत बताई है।
सवाल यह है कि क्या वाकई ऐसी किसी संस्था की जरूरत है, जो यह तय करे कि कौन-सी फिल्म कौन देखेगा। गौरतलब है कि टेलीविजन, विज्ञापन और मीडिया में सेंसरशिप नहीं है। फिल्म उद्योग लंबे समय से मांग कर रहा है कि उसे भी स्व-नियंत्रण का अधिकार दिया जाए। अगर इस विवाद का अपने हित में लाभ उठाते हुए सरकार सेंसर बोर्ड में अपनी वैचारिकता वाले लोग भर देती है, तो यह भी त्रासदी ही होगी।
-वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक