पिछले लोकसभा चुनाव ने न केवल केंद्र की सत्ता बदल दी, बल्कि उसने देश की सियासत को भी उलट-पुलट दिया। वास्तव में इसकी पृष्ठभूमि तीन वर्ष पहले ही बन गई थी, जब 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन ने उथल-पुथल मचा दी थी। मगर इस बदलती सियासत का असली किरदार बनकर उभरे नरेंद्र मोदी, जिन्होंने 2012 में गुजरात विधानसभा के चुनाव में भाजपा को तीसरी बार जीत दिलाई। देश के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने 2014 के लोकसभा चुनाव को डिकोड किया है।
तकरीबन ढाई दशक की पत्रकारिता के दौरान देश की सियासत को एक रिपोर्टर, संपादक और एंकर के रूप में नजदीक से देखने वाले सरदेसाई की यह किताब समकालीन राजनीति के फ्लैशबैक की तरह है। संभवतः देश का यह पहला चुनाव था, जिसमें मीडिया और कॉरपोरेट दुनिया का इतनी खुला दखल था। इस चुनाव को अमेरिकी राष्ट्रपति शैली का चुनाव बनाने में मीडिया के साथ ही कॉरपोरेट जगत की भी अहम भूमिका थी। यदि सरदेसाई के अपने आकलन पर यकीन करें, तो इस चुनाव में भाजपा को 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये के आसपास चंदा मिला! जबकि समय से पहले जैसा कि सरदेसाई ने लिखा है, आईसीयू में चली गई यूपीए सरकार ने देश के कॉरपोरेट वर्ग का समर्थन खो दिया था।
हालांकि उन्होंने यह नहीं लिखा कि संभवतः यूपीए के एक दशक के दौरान किसान-आदिवासियों, गरीबी रेखा से नीचे के लोगों और महिलाओं के सशक्तीकरण करने वाले जितने कानून पारित किए गए, उतने पहले कभी पारित नहीं किए गए। खैर इसकी पड़ताल तो खुद कांग्रेस भी नहीं कर रही है! यह भी सच है कि यूपीए सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम वर्षों में बेबस नजर आने लगी थी। सरदेसाई लिखते हैं कि कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए ने 2014 के चुनाव से काफी पहले 1 जून 2011 को ही जनादेश खो दिया था, जब प्रणब मुखर्जी की अगुआई में उसके चार वरिष्ठ मंत्री बाबा रामदेव को मनाने के लिए दिल्ली हवाई अड्डे पहुंच गए थे। बाद में खुद मुखर्जी ने स्वीकार किया कि यह भयानक चूक थी। मगर वह पिछले लोकसभा चुनाव के लिए पटना में हुई मोदी की उस रैली को टर्निंग पॉइंट मानते हैं, जिसमें बम धमाका हुआ था। इस धमाके के बावजूद मोदी ने वहां भाषण दिया और उसमें इसका जिक्र तक नहीं किया था। भ्रष्टाचार और घोटालों की वजह से निश्चय ही मनमोहन सिंह सरकार ने लोगों का विश्वास खो दिया था, लेकिन सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व ने भी कांग्रेस को इस हाल में ला पटका है। आज भले ही राहुल को पार्टी की पूरी कमान देने की बात फिर से उठ रही है, लेकिन राजनीति को वह नौ से पांच की नौकरी की तरह लेते हैं।
जैसा कि सरदेसाई ने लिखा है, 'राहुल दोहरा जीवन जीते हैं। दिन में वे विचारकों और एक्टिविस्ट के साथ व्यस्त रहते थे, और रात में पेज थ्री में नजर आने वाले पारिवारिक मित्रों के साथ। भारत और इंडिया का विभाजन तो उनके अपने व्यक्तित्व में ही नजर आता है।'
इस किताब से पता चलता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लेखक का किस तरह प्रेम और कटुता वाला रिश्ता रहा है। मोदी भले ही पूरे प्रचार अभियान के दौरान कांग्रेस पर निशाना साध रहे थे, लेकिन वह अरविंद केजरीवाल के उभार को हल्के में नहीं ले रहे थे। केजरीवाल के दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने एक बार सरदेसाई से कहा था, 'तुम्हारे दिल्ली मीडिया को केजरीवाल के आगे कुछ दिखता है या नहीं। बाकी चीफ मिनिस्टर को तुम नहीं दिखाते और केजरीवाल को तुमने नेशनल लीडर बना दिया!' राजनीति का चक्र देखिए कि मोदी के विजय रथ को आज सबसे बड़ी चुनौती केजरीवाल से ही है!