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अपने लोगों के अच्छे दिन कहां

Wed, 05 Aug 2015 08:26 PM IST
सुधाकर आशावादी
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साहब ने औरों के लिए अच्छे दिनों का वायदा तो जरूर किया, मगर अपनों की जेबों को समाजवादी नहीं किया। कम से कम परिवार के लोगों को विधानसभा या संसद में भेजकर उनकी पेंशन का इंतजाम कर देते, तो परिजन बड़ा एहसान मानते। बहन जी के पास जब सत्ता थी, तब उन्होंने सबसे पहले अपने लोगों का भला किया या नहीं? महंगी जगहों पर उन्होंने भाई-भतीजों को होटल खुलवा दिए थे। अपना पर्स भी ढीला नहीं किया और काम भी बन गया। मैंने कई बार साहब से कहा, साहब, हमने भी यदा-कदा 'नमस्ते सदा वत्सले' किया है, इसका कुछ पुरस्कार तो हमें भी मिलना चाहिए। मगर साहब ने हमारी एक नहीं सुनी।
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अभी युधिष्ठिर के पुराने एपिसोड देख साहब ने गजेंद्र चौहान जी को फिल्म इंस्टीट्यूट का मुखिया क्या बना दिया, उसी पर हंगामा हो रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि निक्कर छोड़कर उनकी कोई योग्यता नहीं है। क्या बकवास है! हम कहते हैं कि देश में बदलाव की धारा बहाने के लिए समाजवादी विचारधारा अपनाओ, परिवार के सदस्यों को जोड़कर अधिकाधिक लाभ दिलाओ। मगर ये लोग कुछ समझते ही नहीं!

साहब से बात करो, तो सवा सौ करोड़ का परिवार बताते हैं। किसी से चार जनों का परिवार संभाला नहीं जाता, ये सवा सौ करोड़ की बात करते हैं। क्या साहब अपने परिवार को आधुनिक समाजवाद में नहीं ढाल सकते, जहां चाचा, भतीजे, बहू-बेटे सब मिलकर अपनी सरकारी पेंशन पक्की कर सकते हों? अब साहब के खानदानियों को यदि साहब की छवि बेदाग बनाए रखने के लिए खुद को अभावों से ग्रस्त रखना है, तो उन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं भला कैसे सुहाएंगी?
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मैं तो बहन जी का प्रशंसक हूं। वह एक दिन खुले दिल से भ्रष्टाचार को कोस रही थी, उसकी जिम्मेदारी साहब पर लाद रही थी। मैं टेलीविजन के सामने बैठा मुस्करा रहा था। मुझे हाथी पार्क के निर्माण के दौरान पत्थरों की एक स्थान से दूसरे स्थान तक ईमानदारी से की जा रही ढुलाई याद आ रही थी। सच में, अपनी ईमानदारी का डंका पीटना कितना आसान है।
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