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आशियाने को लोगों की तलाश

Tue, 04 Aug 2015 08:16 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
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इस समय देश में मकानों की कमी और बिना बिके तैयार मकानों की बढ़ती संख्या एक विसंगतिपूर्ण तस्वीर पेश कर रही है। एक ओर देश में करीब दो करोड़ मकानों की कमी है, जबकि दूसरी ओर करीब 1.1 करोड़ सजे-धजे मकान बिक नहीं पाने के कारण खाली पड़े हुए हैं। स्थिति यह है कि आवास क्षेत्र से संबंधित शेयर बाजार में सूचीबद्ध दिग्गज कंपनियों के पास विगत मार्च में करीब 70,000 करोड़ रुपये मूल्य के अनबिके मकान मौजूद थे। आवास संबंधी राष्ट्रीय अध्ययन भी बता रहे हैं कि मौजूदा वर्ष में देश भर में मकानों की कीमतें गिरेंगी और कंपनियों के नकदी प्रवाह की स्थिति बुरी हो जाएगी। इस कारण पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रही आवासीय कंपनियां बैंकों का ऋण चुका पाने में असमर्थ हो सकती हैं!
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देश में मकानों की मांग और अनबिके मकानों की क्या स्थिति है, इसका शहर स्तर पर अनुमान विगत जुलाई में प्रकाशित कंसल्टेंसी फर्म नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा वर्ष की पहली छमाही में दिल्ली-एनसीआर में 14,250 फ्लैटों की बिक्री हुई, यानी बिक्री में 50 प्रतिशत की गिरावट आई है। जबकि नए घरों की पेशकश भी 68 प्रतिशत घटकर 11,360 इकाई ही रह गई। दिल्ली-एनसीआर में बन चुकी, पर बिक नहीं पाई आवासीय इकाइयों की संख्या 1.90 लाख है। चूंकि महंगे मकानों की अधिकांश खरीद निवेश के उद्देश्य से की गई है, इसलिए आवास क्षेत्र के हालात और खराब हो गए हैं। देश में आवास क्षेत्र में सुधार की संभावना इसलिए कम है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्ती की चपेट में है और भारतीय अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं है।

ऐसे में, केंद्र सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह तत्काल आवास क्षेत्र की विसंगति को दूर करने की पहल करे। जरूरी है कि न सिर्फ बढ़ती जनसंख्या और तेज शहरीकरण के कारण मकानों की कमी झेल रहे आम लोगों को घर मिले, बल्कि लागत कम करने और मकानों की बिक्री के लिए प्रोत्साहनदायक सहयोग के लिए भी हाथ बढ़ाया जाए। चूंकि वर्तमान में मकानों की करीब 75 फीसदी समस्या समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग वाले लोगों से जुड़ी हुई है। इसलिए इस वर्ग के लोगों को आवास हेतु जमीन उपलब्ध कराने एवं आवास ऋण पर ब्याज व अन्य सब्सिडी मुहैया कराने की खास जरूरत है। इसके साथ-साथ जिन लोगों के पास मकान खरीदने की व्यवस्था नहीं है, उनके लिए किराये के मकानों की व्यवस्था सरल की जानी चाहिए।
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इतना ही नहीं, आवास निर्माण से जुड़ी कंपनियों की वित्तीय चिंताओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है। आवास ऋण पर ब्याज की दर कम करने की जरूरत है। रियल एस्टेट एवं हाउसिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए नए आयकर प्रोत्साहनों की जरूरत है। इसके लिए सरकारी शुल्क कम किए जाने चाहिए। इससे मकानों की कीमतों में कमी आएगी। इससे आवास निर्माण कंपनियों का नकदी प्रवाह संभावित नकारात्मकता से बचेगा, और वे बैंकों के ऋण चुकाने में भी सक्षम बने रहेंगे। आवास क्षेत्र को प्रस्तावित जीएसटी के दायरे में लाए जाने की कोशिश होनी चाहिए, ताकि खरीदार और विक्रेता, दोनों को लाभ मिले। क्या केंद्र सरकार इस विसंगति को खत्म करने का प्रयास करेगी?
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