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देवी सीता के पिता जनक जी के बारे में यह बात आप नहीं जानते होंगे

Thu, 04 Jun 2015 01:46 PM IST
जानकीनाथ शर्मा
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महाराज जनक के राज्य में एक ब्राह्मण से भूलवश कोई भारी अपराध हो गया। महाराज ने उसे दंडस्वरूप अपने राज्य से बाहर चले जाने की आज्ञा दी। इस आज्ञा को सुनकर ब्राह्मण ने जनक से पूछा, महाराज, मुझे यह बता दीजिए कि आपका राज्य कहां तक है? तब मुझे आपके राज्य से निकल जाने का ठीक-ठाक ज्ञान हो सकेगा।
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जनक स्वभावतः विरक्त और ब्रह्मज्ञान में लीन रहने वाले महाराज थे। ब्राह्मण के इस प्रश्न को सुनकर वह विचारने लगे, पहले तो परंपरागत संपूर्ण पृथ्वी पर ही उन्हें अपना अधिकार-सा दिखा। फिर मिथिला नगरी पर उन्हें वह अधिकार दिखने लगा। आत्मज्ञान के झोंके में पुनः उनका अधिकार घटकर प्रजा पर, फिर अपने शरीर पर आ गया।

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अंत में कहीं भी उन्हें अपने अधिकार का भान नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने ब्राह्मण को अपनी सारी स्थिति समझाई, और कहा, किसी वस्तु पर भी मेरा अधिकार नहीं है, इसलिए आपकी जहां रहने की इच्छा हो, वहीं रहिए।
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यह सुनकर ब्राह्मण को आश्चर्य हुआ। उसने जनक से पूछा, महाराज, आप इतने बड़े राज्य को अपने अधिकार में रखते हुए ऐसा कैसे कह सकते हैं? जनक ने जवाब दिया, संसार के सब पदार्थ नश्वर हैं। अतएव मैं किसी वस्तु को अपनी कैसे समझूं? अब जिस बुद्धि से सारे विश्व पर अपना अधिकार समझता हूं, वह सुनिए। मैं अपने संतोष के लिए कुछ भी न कर देवता, पितर और अतिथि-सेवा के लिए करता हूं। इसलिए पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश और अपने मन पर भी मेरा अधिकार है।

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जनक के इन वचनों के साथ ही ब्राह्मण ने अपना चोला बदल लिया। अब वहां एक दिव्य पुरुष मौजूद था। उसने जनक से कहा, महाराज, मैं धर्म हूं। आपकी परीक्षा के लिए आया था। समझ गया कि आप सत्वगुण रूप हैं।
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