इस समय बच्चों से लेकर सरकार तक के रिजल्ट अनाउंस हो रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि सरकार अपनी कॉपी स्वयं जांच रही है और बच्चों का मूल्यांकन पैरेंट्स, स्कूल, सरकार, कोचिंग, परिचित, अपरिचित, ज्ञानी, अज्ञानी सब करने पर तुले हैं, गोया सब मिले हुए हैं। इसी डर के मारे कई बच्चे नब्बे से ऊपर लाकर भी फेल-सा फील कर रहे हैं। एकाध प्रतिशत कम क्या आए, पैरेंट्स अपनी ही अपेक्षाओं की एग्जाम में फेल होकर औंधे मुंह पड़े हैं।
कल तक तारे जमीन पर थे, आज पैरेंट्स 'जमीन' पर हैं। अब फेसबुक को क्या मुंह दिखाएं, ट्वीटर पर किस जुबान में चहकें, व्हाट्सएप पर क्या भेजकर इतराएं! साल भर अपने नौनिहालों के रीडिंग और प्लेइंग के फोटो अपलोड कर गदर मचाने वाले पैरेंट्स आज एक प्रतिशत से पराजित होकर चोर की तरह अपनी ही रहस्य गुफा में छुपे बैठे हैं। फेसबुक पर अपलोड होती हर मार्कशीट जैसे उन्हें ही जलील कर रही है। उनकी हालत देखकर स्माइली, स्टिकर तक समझ नहीं पा रहे हैं कि इस मौके पर क्या फीलिंग्स दें!
अंक सिर्फ अंक ही नहीं होते। वे मोहल्ले में किसी शर्मा जी, वर्मा जी, दूबे जी की होर्डिंग की तरह टंगी प्रतिष्ठा भी होते हैं। दूसरों से ऊंची और नुकीली नाक भी होते हैं। स्वघोषित मान, मर्यादा, नाम भी होते हैं। बच्चों के एडमिशन के साथ जो नाक उगाई थी, आज एकाध प्रतिशत की कमी से वह कटकर दूर जा गिरी है। अब यह सोच-सोचकर शर्म से गड़े जा रहे हैं कि मनपसंद कॉलेज में दाखिला नहीं मिला, तो मन के किसी कोने में छिपाकर रखी उनकी सल्तनत लुट जाएगी। फिर रही-सही नाक भी जड़ से उखड़ जाएगी। एक प्रतिशत ने झटके में सात जन्म अकारथ कर दिए। वर्तमान से लेकर परलोक तक सब बिगड़ गए।
जिन चेहरों की नाक प्रतिशत की धार से कट जाती है, वे चेहरे बड़े अजीब-ओ-गरीब दिखने लगते हैं। बच्चों को ऐसे चेहरे बड़े डरावने लगते हैं। वे कम प्रतिशत से इतने भयभीत नहीं होते, जितने कटी नाक वाले विकृत चेहरों से होते हैं। यह अवसाद कई बार बड़ा नुकसान कर देती है।