पिछले कुछ दिनों में बिहार का राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी निष्ठा बदलकर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठजोड़ कर लिया। नतीजतन विपक्षी दलों का महागठबंधन टूट गया और यह खबर मीडिया की सुर्खियां बनीं। लेकिन क्या बिहार में ये बातें सबसे ज्यादा मायने रखती हैं कि कौन गया, कौन रहा और किसका किसके साथ नाता है। ये सभी महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिन्हें कई राष्ट्रीय चर्चाओं में याद किया जाता है, क्योंकि ये अखबारों, टेलीविजन और सोशल मीडिया के जरिये सामने आते हैं। लेकिन बिहार के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं, वे कुछ और हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी मानव विकास, रोजगार, पिछड़ेपन से मुक्ति आदि बिहार के लिए ज्यादा मायने रखते हैं।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश समेत बिहार की आबादी देश में सबसे युवा है। यह संभावित रूप से किसी राज्य की बड़ी संपदा है, लेकिन वास्तविकता क्या है, आइए, जरा इसकी पड़ताल करते हैं। बिहार में बहुत-सी लड़कियों और महिलाओं को पोषक आहार नहीं मिलता है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान बहुत-सी महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। और उच्च गुणवत्तापूर्ण, जीवन को उन्नत बनाने वाली स्वास्थ्य देखभाल की भारी कमी है।
असर (एएसईआर) के 2016 के सर्वेक्षण के मुताबिक, बिहार में तीसरी कक्षा के मात्र 18 छात्र ही शब्दों को पढ़ पाते हैं। असम, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे अन्य प्रदेश भी इसी तरह के संकट से गुजर रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि शिक्षा पर सार्वजनिक धन खर्च नहीं किया जा रहा है। बिहार उच्च फोकस वाले राज्यों में से एक है, जहां 2011-12 की तुलना में 2014-15 में प्राथमिक विद्यालयों के प्रति छात्र की शिक्षा पर काफी खर्च किया गया। लेकिन डेटा जर्नलिज्म वेबसाइट इंडिया स्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक शिक्षा के परिणामों में सुधार नहीं हुआ। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलने के कारण इन बच्चों के पीछे रह जाने की आशंका है और जो उत्पादक एवं कुशल होने की उनकी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएंगा। इससे देश के विकास और लोगों जीवन-स्तर पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति कई राज्य जो दृष्टिकोण अपनाते हैं, वे किसी भी आधुनिक समाज के निर्माण में बाधा पैदा करते हैं। कई राज्य भौतिक बुनियादी ढांचे पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं, जैसे कई राज्य शिक्षा में प्रगति या शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार के बजाय स्कूल भवनों का निर्माण, पेयजल एवं शौचालय की उपलब्धता और छात्रों के दाखिले में बढ़ोतरी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। बुनियादी संरचनाओं में निवेश निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन अपने आप वे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की गारंटी नहीं देते, जैसा कि हम बिहार समेत कई राज्यों में देखते हैं।
उदाहरण के लिए, शिक्षा पर एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (यू-डीआईएसई) के अनुसार, बिहार के प्राथमिक विद्यालयों में सकल नामांकन अनुपात (कुल प्रारंभिक उम्र के बच्चों की आबादी की तुलना में स्कूलों में किसी भी उम्र के छात्रों का दाखिला) 2011-12 के 59.8 फीसदी से बढ़कर 2014-15 में 98.07 फीसदी हो गया। भौतिक बुनियादी संरचनाओं के मामले में भी प्रगति हुई है, जैसे शौचालय वाले स्कूलों की संख्या 2012 में 51.2 फीसदी थी, जो 2016 में बढ़कर 70.6 फीसदी हो गई है। लेकिन इन सबके बावजूद शिक्षा में महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ।
बीते जुलाई में एक छात्र ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक खुली चिट्ठी लिखी थी, जिसमें कहा गया था कि इस बार बिहार बोर्ड परीक्षाओं में 16.5 लाख छात्र (आठ लाख बारहवीं में और 8.5 लाख दसवीं में) अनुत्तीर्ण हुए। इंटरमीडिएट की परीक्षा में मात्र 38 फीसदी सफलता दर पूरे देश में सबसे कम है। उस छात्र के मुताबिक इस शर्मनाक आंकड़ों के निहित कारण एक दूसरे आंकड़े में छिपे हैं। बिहार में शिक्षकों की भारी कमी है। जो शिक्षक उपलब्ध हैं, उनमें से भी 28 फीसदी अनुपस्थित रहते हैं।
इसके अलावा, उस छात्र ने अपनी चिट्ठी में यह भी बताया कि बिहार में हालांकि शिक्षा मित्र योजना के तहत 1.5 पैरा-शिक्षकों को नियुक्त किया गया, लेकिन उनकी नियुक्ति वास्तव में योग्यता के आधार पर नहीं की गई। अंत में उस पत्र में यह कहा गया, कि 'आप देख सकते हैं कि बुनियादी समस्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षक और स्वस्थ कक्षाओं की अवधारणा के अभाव की है। अन्य बोर्डों के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए बिहार के छात्रों को जिन समस्याओं से जूझना पड़ता है, आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते।'
इस उन्मादी दौर में यह कहना आसान है कि जिस छात्र ने यह पत्र लिखा, वह नीतीश कुमार के राजनीतिक विरोधियों के उकसावे में आ गया होगा। लेकिन उसने पत्र में जिन बिंदुओं को उठाया है, उसे खारिज करना आसान नहीं है। बिहार पूरी बेचैनी के साथ पिछड़ेपन के कलंक को धोना चाहता है। वहां जो भी सत्ता में है, उसे बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के मुद्दे को पूरी गंभीरता से लेना चाहिए। अन्यथा युवा आबादी वाले इस राज्य में, जो इतिहास और संस्कृति के मामले में भी समृद्ध है और जिसने देश को रामधारी सिंह 'दिनकर' जैसा प्रखर कवि दिया, उनकी प्रसिद्ध काव्य पंक्ति सिंहासन खाली करो कि जनता आती है जैसी स्थति पैदा हो सकती है।
ऐसा कोई कारण नहीं है कि बिहार खुद को पिछड़ेपन से नहीं उबार सकता और विकास के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन ऐसा करने के लिए नीतीश कुमार की सरकार को दृढ़ता से बुनियादी मानव विकास पर ध्यान देना पड़ेगा और वहां की जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा।