अफगानिस्तान की कहानी अलग है। वहां तालिबान के क्रूर शासन ने महिलाओं को सार्वजनिक परिदृश्य से दूर कर दिया है। कई प्रतिभाशाली अफगान महिलाओं को मान्यता मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में जनता द्वारा चुनी गई महिला नेता प्रधानमंत्री बनी हैं, लेकिन जब बुनियादी बातों की बात आती है, तो पाकिस्तान की हुकूमतें महिलाओं को निर्णय लेने में हिस्सेदारी करने से हतोत्साहित करती हैं। यहां तक कि मंत्रिमंडल में भी महिलाओं की संख्या बहुत कम है और उन्हें महत्वपूर्ण व निर्णय लेने वाले मंत्रालय नहीं दिए गए हैं। आज प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के मंत्रिमंडल में सिर्फ एक पूर्ण महिला मंत्री और एक राज्य मंत्री या कनिष्ठ मंत्री हैं। वरिष्ठ पत्रकार जुबैदा मुस्तफा ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘हम एक वर्ग आधारित समाज में रहते हैं, जहां उच्च वर्ग की महिलाओं के पास कुछ साधन होते हैं, जबकि निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं के पास बहुत कम या बिल्कुल भी साधन नहीं होते हैं।’
यह टिप्पणी ऐसे समय में की गई है, जब संघीय और प्रांतीय मंत्रिमंडल पुरुष-प्रधान बने हुए हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के शासन में स्थिति और भी बदतर है, जो अपने दृष्टिकोण में बहुत रूढ़िवादी है। लेकिन जब बात अपने ही परिवार में महिलाओं को ऊंचा ओहदा देने की आती है, तो हम पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भतीजी मरियम नवाज शरीफ को पंजाब की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में देखते हैं। मरियम नवाज शरीफ ने हालात में बदलाव के लिए महिला राजनेताओं को महत्वपूर्ण पदों पर लाया है, लेकिन उनके मंत्रिमंडल में भी सिर्फ दो महिला कैबिनेट मंत्री हैं। अन्य किसी भी प्रांत में कभी कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं रही है। खैबर पख्तूनख्वा में एक भी महिला कैबिनेट मंत्री नहीं है, जहां सामान्य सीट से केवल एक महिला और आरक्षित सीटों से पांच महिलाएं चुनी गई हैं। बलूचिस्तान में भी महिलाओं की उपेक्षा की गई है तथा कैबिनेट में शिक्षा मंत्रालय का नेतृत्व केवल एक महिला मंत्री के हाथों में है। हाल ही में एक शोधपूर्ण आलेख ग्लास सीलिंग इन गवर्नेंस होल्ड फर्म में लेखक ने दिलचस्प टिप्पणियां की हैं-‘लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कमजोरों का उत्थान करना है। पाकिस्तान में इसके विपरीत लोकतंत्र पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के प्रभुत्व को और मजबूत करता है। इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि राजनीतिक नेतृत्व पुरुषों का क्लब बना हुआ है, जबकि आधी आबादी की प्रतिभा घर संभालने तक ही सीमित है।’
उदाहरण के लिए, मैं वर्तमान पीएमएल-एन सरकार में विदेश मंत्रालय की बैठकों को देख रही थी। कुछ बैठकों में विदेश सचिव आमना बलूच मौजूद रहती हैं। विदेश मंत्रालय के इतिहास में आमना बलूच इस उच्च पद पर पहुंचने वाली दूसरी महिला हैं। जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सरकार में थी, तो इस मामले में वह अधिक उदार थी और उसने एक बार हिना रब्बानी खार को विदेश मंत्री बनाया तथा दूसरी बार विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व में उप विदेश मंत्री बनाया। दरअसल, हिना रब्बानी खार की वजह से ही विदेश मंत्रालय में एक महिला प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच का उदय हुआ, जो अपनी भूमिका में बेहतरीन रहीं। उन्हें अब फ्रांस में पाकिस्तान की राजदूत के तौर पर भेजा गया है। उनसे पहले भी दो महिला प्रवक्ता रह चुकी हैं। आज विदेश कार्यालय में ग्रेड 22 में केवल दो महिलाएं हैं, जबकि ग्रेड 21 में केवल चार महिलाएं हैं। मंत्रालय में कुल संख्या में से केवल 22 फीसदी महिला राजनयिक हैं। कुछ राजनयिकों के अनुसार, उम्मीद है कि वर्ष 2026 में अधिक महिला राजनयिकों को पदोन्नत किया जाएगा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का सकारात्मक पहलू यह है कि दुनिया की महत्वपूर्ण राजधानियों में कई महिला राजदूत हैं, जो शानदार काम कर रही हैं। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में वाशिंगटन, मास्को, नई दिल्ली, पेरेपुन, न्यूयॉर्क और अंकारा जैसी महत्वपूर्ण राजधानियों में पाकिस्तानी महिला राजदूतों की नियुक्ति होगी। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की पूर्व अध्यक्ष जोहरा यूसुफ कहती हैं, ‘मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि पाकिस्तान में निर्णय लेने वाली संरचना स्त्री-विरोधी है। महिला समानता और अधिकारों की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन नेतृत्व के पदों पर उन्हें स्वीकार करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने का अभाव है।’
हालांकि, महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली बैठकों में पर्याप्त संख्या में महिलाओं के मौजूद नहीं रहने के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि मौका मिलने पर पाकिस्तानी महिलाओं ने न केवल पाकिस्तान में, बल्कि अन्य देशों में भी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है। ऐसी महिलाओं की सूची बहुत लंबी है, लेफ्टिनेंट जनरल निगार जौहर आर्मी मेडिकल कोर (एएमसी) में पहली तीन सितारा महिला जनरल थीं। इसके अलावा, पाकिस्तान की क्रिकेट आइकन सना मीर और खैबर पख्तूनख्वा के इतिहास में पहली बार सहायक महानिरीक्षक के रूप में तैनात आयशा गुल का भी नाम लिया जा सकता है। फिर आयशा मलिक सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश बनीं, तो सवाल यह है कि अगर हमारे पास विभिन्न क्षेत्रों में इतनी उत्कृष्ट महिला नेता हैं, तो हुकूमतें अधिक संख्या में महिलाओं को सरकार में शामिल क्यों नहीं करतीं? महिलाओं के साथ सत्ता साझा करते समय वे क्यों खतरा महसूस करती हैं और स्वार्थी बनी रहती हैं?