सिद्ध, ऐश्वर्य आदि के अर्थ में ‘भग’ शब्द का प्रयोग होता है। यह संपूर्ण ऐश्वर्य आदि रूप जिनके भीतर विद्यमान हैं, वे दुर्गा ‘भगवती’ कही गई हैं।
विश्व के समस्त प्राणियों को जन्म, मृत्यु, जरा तथा मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले गुण के कारण उन्हें ‘सर्वाणी’ कहा गया है। ‘मंगल’ शब्द मोक्ष के साथ हर्ष, संपत्ति और कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इन सबको देने वाली देवी दुर्गा, इसलिए ‘सर्वमंगला’ के नाम से भी विख्यात हैं। ‘अंबा’ शब्द माता का वाचक है तथा पूजन के अर्थ में भी ‘अंब’ शब्द का प्रयोग होता है। देवी दुर्गा, सबके द्वारा पूजित हैं और तीनों लोकों की माता हैं, इसलिए ‘अंबिका’ कहलाती हैं। देवी श्रीविष्णु की भक्ता, विष्णुरूपा तथा विष्णु की शक्ति हैं। विष्णु के द्वारा ही उनकी सृष्टि हुई है। इसलिए उनका एक नाम ‘वैष्णवी’ भी है। ‘गौर’ शब्द पीले रंग, निर्लिप्त एवं निर्मल के अर्थ में प्रयुक्त होता है। वे देवी ‘गौर’ परमात्मा की शक्ति हैं, इसलिए ‘गौरी’ कही गई हैं। भगवान शिव सबके गुरु हैं और देवी उनकी सती-साध्वी प्रिया शक्ति हैं। इसलिए 'गौरी' कही गई हैं। श्रीकृष्ण सबके गुरु हैं और देवी उनकी माया हैं। इसलिए भी उनको ‘गौरी’ कहा गया है। ‘पर्व’ शब्द तिथिभेद (पूर्णिमा), पर्वभेद, कल्पभेद तथा अन्यान्य भेद अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा ‘ती’ शब्द ख्याति के अर्थ में आता है। पर्व आदि में विख्यात होने से देवी दुर्गा को ‘पार्वती’ कहते हैं। पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री होने के कारण भी उन्हें ‘पार्वती’ कहा जाता है। ‘सना‘ का अर्थ है सर्वदा और ‘तनी’ का अर्थ है विद्यमान। सर्वत्र और सब काल में विद्यमान होने से वे देवी ‘सनातनी’ कही गई हैं।
सबसे पहले परमात्मा श्रीकृष्ण ने सृष्टि के आदिकाल में गोलोकवर्ती वृंदावन के रासमंडल में देवी की पूजा की थी। दूसरी बार मधु व कैटभ से भयभीत होकर ब्रह्मा जी ने उनकी पूजा की। तीसरी बार त्रिपुरारी महादेव ने त्रिपुर से प्रेरित होकर देवी का पूजन किया था। चौथी बार महर्षि दुर्वासा के शाप से राज्यलक्ष्मी से भ्रष्ट हुए देवराज इंद्र ने देवी भगवती की आराधना की थी। तभी से मुनींद्रों, सिद्धेंद्रों, देवताओं व महर्षियों द्वारा संपूर्ण विश्व में सब ओर देवी की पूजा होने लगी। पूर्वकाल में संपूर्ण देवताओं के तेज पुंज से देवी प्रकट हुई थीं। उस समय सब देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्र और आभूषण दिए थे। उन्हीं देवी ने दैत्यों का वध किया और देवताओं को अभीष्ट वर दिए थे। दूसरे कल्प में महात्मा राजा सुरथ ने सरिता के तट पर मिट्टी की मूर्ति में देवी की पूजा की थी। उन्होंने वेदोक्त सोलह उपचार अर्पित करके विधिवत पूजन और ध्यान के पश्चात कवच धारण किया तथा परिहार नामक स्तुति करके अभीष्ट वर पाया।