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इन कठोर फैसलों पर क्या कहेंगे प्रधानमंत्री जी

Thu, 19 Jun 2014 07:32 PM IST
कुमार प्रशांत
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कुछ न बोलने वाले प्रधानमंत्री की जगह हमें अब बहुत कुछ बोलने वाला प्रधानमंत्री मिला है! बोलने की बात चली है, तो लगता है कि धरती अगर गोवा की हो, तो भारतीय जनता पार्टी के ज्ञानचक्षु खुल जाते हैं। प्रधानमंत्री के भी खुले! वहां जाकर उन्होंने कहा कि अच्छे दिन आ गए हैं और इसलिए कठोर फैसले करने होंगे। तो कहें प्रधानमंत्री कि वह क्या कठोर फैसले लेना चाहते हैं?
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हम बड़े-बड़े फैसलों की बात तो नहीं जानते, क्योंकि वे तो बड़े-बड़े विशेषज्ञों के बस की बात है। लेकिन सरकार, आप हमसे पूछिए, तो हम भी बता सकते हैं कि आपको क्या-क्या कठोर फैसले लेने चाहिए। पहला कठोर फैसला यह होना चाहिए कि पिछली सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का जितना बेजा इस्तेमाल किया है, यह सरकार वह कभी नहीं करेगी। हम यह सीधी-सी बात याद रखें कि हमारा संकट संविधान की मर्यादाओं के कारण उतना नहीं है, जितना संविधान की मर्यादाओं का उल्लंघन करने के कारण है। इसलिए प्रधानमंत्री यह फैसला लें कि वह बड़ा मंत्रिमंडल नहीं बनाएंगे, बल्कि अपने मंत्रियों को बड़ी जवाबदेहियां उठाने को तैयार करेंगे। तीसरी बात यह कि जितना विपक्ष बचा है, उसे सारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में शामिल किया जाएगा।

सरकारी खर्च में बहुत बड़ी कटौती जरूरी है। सरकारी खर्च आज की तुलना में कम-से-कम आधा किया जाना चाहिए। यह बहुत कठिन होगा, क्योंकि दिखावा प्रधानमंत्री को भी बहुत पसंद है। पर देश की जरूरत यह है कि सरकारी तामझाम, वेतन-भत्ते, दफ्तरों की बेशकीमती सजावट, अमर्यादित विशिष्ट हवाई यात्राएं, सरकारी भोज-भत्ता आदि सबमें बड़ी कटौती हो। ऐसी कटौती न सिर्फ डगमगाती आर्थिक स्थिति को स्थिरता देगी, बल्कि उस स्थिरता को मानसिक आधार भी देगी।
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तीसरा कड़ा फैसला महंगाई के संदर्भ में लेना है। मोदी सरकार को समझना चाहिए कि यह महंगाई किसी गूढ़ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थिति का परिणाम नहीं है, बल्कि आंतरिक व्यवस्थाजन्य है। उत्पादन में कमी, मांग में वृद्धि और वितरण में बेईमानी-ये तीन कारण हैं कि हम महंगाई पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। उत्पादन बढ़ाना और वितरण प्रणाली को सुव्यवस्थित करना सरकार की लंबी योजना का हिस्सा हो, यह बहुत जरूरी है। लेकिन तत्काल जरूरी है कि थोक बाजार में जमाखोरी के खिलाफ और खुदरा बाजार में मनमानी के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

चौथा कठोर कदम निवेश के स्तर पर उठाना है। मोदी सरकार को यह कड़ा फैसला करना होगा कि निवेशक एक का दो बनाएं, हम इसकी संभावना खत्म नहीं करेंगे, लेकिन एक का हजार बनाने के चलन को तुरंत बंद करेंगे। संदेश सीधा है-हमारे देश में आओ और कमाओ, लेकिन लूटने की मंशा मत रखो, क्योंकि हम इससे अधिक मुनाफे की इजाजत देते नहीं हैं। अगर ऊपर के सारे कदम मोदी सरकार ईमानदारी से उठाती है, तो उससे वह माहौल बनेगा कि ईमानदार निवेशकों की कमी नहीं रहेगी। एक भ्रष्ट तंत्र एक भ्रष्ट समाज का निर्माण करता है, यह जितना सच है, इसका उल्टा भी उतना ही सच है। मोदी सरकार बताए कि उसका अपना सच क्या है?
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