हमास को दंडित करने के लिए इस्राइल की ओर से गाजा में की जा रही कार्रवाई में 38,000 फलस्तीनियों की मौत हो चुकी है। शहर, कस्बे, इमारतें, स्कूल और अस्पताल मलबे में तब्दील हो गए हैं। अनेक असहाय फलस्तीनियों को गाजा के एक इलाके से दूसरे इलाके में मवेशियों की तरह धकेला जा रहा है, यह तर्कसंगत नहीं लगता। जहां उन असहाय फलस्तीनियों को भेजा गया है, वहां न तो खाने का बंदोबस्त है और न ही रहने का ठिकाना, बुनियादी सुविधाओं की तो बात ही छोड़ दीजिए। जिस अमानवीय अपराध के लिए हमास को नेतन्याहू दंडित करना चाहते हैं, वह खुद अब उसी तरह बर्बरता कर रहे हैं।
हालांकि हमास के हमले से लगता है कि नेतन्याहू को बहुत बड़ी राहत मिली है। भ्रष्टाचार के कई आरोपों में घिरे नेतन्याहू की सत्ता जाने के कगार पर थी। लेकिन पिछले साल अक्तूबर में जैसे ही हमास ने इस्राइल पर हमला किया, नेतन्याहू को राहत मिल गई। यहां तक कि सरकार में बैठे उनके कट्टर विरोधी भी उनका समर्थन करने लगे। तब से वह धरती से हमास को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि उनके मंत्रिमंडल के आधे मंत्रियों एवं कुछ इस्राइली रक्षा बल (आईडीएफ) के जनरलों को भी यकीन नहीं है कि इस्राइल गाजा में युद्ध जीत रहा है। इसके अलावा, इस्राइल पर हिजबुल्ला और हुती के हमले से यह लड़ाई लेबनान और यमन तक फैल गई है।
अगर इस्राइली रक्षा बल हमास के आखिरी लड़ाके को भी मार देता है, तो क्या उससे हमास खत्म हो जाएगा? अगर कोई ऐसा सोचता है, तो यह उसका भोलापन ही होगा। किसी विवाद को सुलझाने के लिए हिंसक रास्ते और तरीके, चाहे कोई भी अपनाए, गलत हैं और उनका बचाव नहीं किया जा सकता। लेकिन दुखद है कि बहुत कम मुसलमान हमास के व्यापक उद्देश्य की वैधता पर सवाल उठाते हैं। उसका उद्देश्य है-फलस्तीनी इलाकों पर इस्राइल के कब्जे को खत्म करना।
सड़कों पर उतरे लाखों अरबवासियों के सामने हमास इस्राइल के प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए जब तक फलस्तीनी इलाकों पर इस्राइल का कब्जा बरकरार रहेगा, हमास जैसे हिंसक संगठन (चाहे वे किसी भी नाम से हों) फलस्तीनी युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करते रहेंगे। नेतन्याहू के पास इस्राइल के लिए कोई दीर्घकालिक दूरगामी दृष्टि नहीं है, बल्कि उनके लिए उनका अपना राजनीतिक अस्तित्व ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमास को खत्म करने के लिए उन्होंने गाजा में जो युद्ध छेड़ा है, उससे निर्दोष फलस्तीनियों को तो पीड़ा हुई ही है, इस्राइल के दीर्घकालिक हितों को भी नुकसान पहुंचा है।
अगर वे यित्जाक राबिन और शिमोन पेरेज जैसे राजनेता होते, तो उन्हें एहसास होता कि इस्राइल की निर्विवाद सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद उसकी दीर्घकालिक सुरक्षा और इस्राइली लोगों की शांति के लिए बातचीत और कूटनीति के जरिये फलस्तीनियों के साथ शांति के अलावा कोई विकल्प नहीं था। यह मसला बम और मिसाइलों के जरिये नहीं सुलझाया जा सकता है! कई नेता इतिहास की धूल में दफन हो गए हैं और समय बीतता जाता है, लेकिन द्विराष्ट्र समाधान ही फलस्तीनी-इस्राइल संघर्ष को समाप्त करने का एकमात्र व्यावहारिक उपाय था, है और रहेगा।
अफसोस की बात है कि गाजा और वेस्ट बैंक में अपने दस महीने लंबे अभियान के जरिये नेतन्याहू ने परोक्ष रूप से जितने लोगों को मारा है, उससे दस गुना ज्यादा भावी फलस्तीनी लड़ाकों को जन्म दिया है। एक फलस्तीनी लड़का, जिसने अपनी आंखों से अपने माता-पिता को इस्राइली बमों से मरते और मलबे के नीचे दबे हुए देखा है, अगर वह अगले दस वर्षों तक सभी बाधाओं के बावजूद जिंदा रहता है, तो 15 साल की उम्र में इस्राइलियों के लाफ बंदूक उठा सकता है। बदले की आग सिर्फ एक पक्ष को ही नहीं जलाती, बल्कि दोनों पक्षों को नुकसान पहुंचाती है। बदले की यह आग आखिर कब बुझेगी?