लेबनान के इतिहास में औन की यह पहली सरकार है, जो इस्राइली सीमा के नजदीक हिजबुल्ला के गढ़ों को कमजोर करने में लगी हुई है, लेकिन शर्त यह है कि इस्राइल दक्षिणी लेबनान में अपने कब्जे वाली पांच सैन्य चौकियों से हट जाए। हिजबुल्ला ऐसा संगठन नहीं है, जो शांति से चला जाए, यदि उसके पास अन्य विकल्प हों, तब भी नहीं। लेकिन ऐसा इसलिए संभव लग रहा है, क्योंकि बीते साल इस्राइल ने हिजबुल्ला पर प्रभावी हमले कर लगभग उसकी कमर तोड़ दी थी।
इसलिए अब लेबनानी राज्य के लिए फिर से संप्रभुता प्राप्त करना, अर्थात अपनी सीमाओं के भीतर बल प्रयोग पर एकाधिकार प्राप्त करना संभव हो गया है। और यह केवल इस्राइल की जीत के कारण ही संभव है कि विस्तारित अब्राहम समझौते के हिस्से के रूप में यरुशलम और बेरूत के बीच शांति समझौते की वास्तविक संभावना है।
सीरिया में भी ऐसी ही एक आशाजनक कहानी गढ़ी जा रही है, जहां बीते हफ्ते ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रपति अहमद अल-शरा की सरकार पर लगे प्रतिबंध हटा लिए। अल-शरा के प्रति गर्मजोशी दिखाने में अमेरिका इस्राइल से एक कदम आगे रहा है, जो कभी अल-कायदा की एक शाखा का नेतृत्व करते थे और जिन्हें कुछ इस्राइली नेता आज भी एक गुप्त जिहादी मानते हैं। अब ऐसी खबरें हैं कि यरुशलम और दमिश्क के बीच एक वास्तविक शांति समझौते के लिए बातचीत चल रही है। देखना होगा कि यह बातचीत कहां तक जाती है। लेकिन यह असंभव होता, अगर अल-शरा के विद्रोहियों के सत्ता में आने से पहले इस्राइल ने हिजबुल्ला को बर्बाद न किया होता और बशर अल-असद के शासन को उसके सबसे प्रभावी सैन्य हथियारों में से एक से वंचित न किया होता। यदि बीते साल इस्राइल ने सीरिया के कई हथियार भंडारों को नष्ट न किया होता, तो आज यरुशलम और दमिश्क बातचीत के लिए तैयार नहीं होते, और इस्राइल को अपने उत्तर में हमेशा खतरे की आशंका रहती।
अब बात गाजा की। सात जुलाई को व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रात्रिभोज के बाद इस्राइली अधिकारियों ने संकेत दिए है कि वे एक समझौते के करीब हैं, जिसके तहत हमास द्वारा और बंधकों की रिहाई के बदले में लड़ाई रोक दी जाएगी। ट्रंप का अनुमान है कि यह समझौता जल्द हो सकता है। ऐसा इसलिए नहीं हो रहा है कि नेतन्याहू सरकार और हमास नेतृत्व को अचानक यह एहसास हो गया है कि गाजा में बहुत तबाही हो चुकी है और लोग पीड़ित हैं। ऐसा तो हो चुका, लेकिन इसका अंत देखना सभी के हित में है। लेकिन मानवीय अपीलें कितनी भी ईमानदार हों, या नैतिक धमकियां कितनी भी प्रभावी हों, लड़ाई को रोकने में लगभग कोई योगदान नहीं दे पाई हैं। युद्ध ग्रेटा थनबर्ग के नाव पर सवार होने भर से समाप्त नहीं हो जाते।
असल में ताकत का गणित ही मायने रखता है। हमास की ओर से उसका बढ़ता कूटनीतिक लचीलापन लगभग पूरी तरह से उसकी पूर्ण हार के निकट होने का परिणाम है। बीबीसी के अनुसार, हमास के एक पदाधिकारी ने निजी तौर पर बताया कि उसका 95 फीसदी नेतृत्व खत्म हो चुका है और हमास ने 80 प्रतिशत क्षेत्र पर अपना नियंत्रण खो दिया है। कई गाजावासी हमास के खिलाफ हो गए हैं, उसके सुरक्षा मुख्यालयों को लूट रहे हैं तथा भोजन व सुरक्षा के लिए स्थानीय कबीलों की ओर लौट रहे हैं। ये वे परिस्थितियां हैं, जिनके तहत हमास के बचे हुए सदस्य अंततः हथियार डालने और निर्वासन में जाने के लिए सहमत हो सकते हैं, जिससे अंततः लड़ाई के स्थायी अंत, नए शासन और अत्यंत आवश्यक पुनर्निर्माण की संभावना पैदा होगी। इस्राइल की तरफ से दिख रहे कूटनीतिक लचीलेपन के तीन कारण हैं। पहला, 21 महीने की लड़ाई के कारण इस्राइली जनता की थकान समझी जा सकती है।
दूसरा, समझौते के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का दबाव और नेतन्याहू द्वारा उन्हें खुश करने का प्रयास करना है। लेकिन इनमें से कोई भी कारक पर्याप्त नहीं होता, यदि इस्राइल ने ईरान पर सैन्य सफलता हासिल न की होती। इस्राइल के दृष्टिकोण से ही उसके अभियान में अमेरिका की भागीदारी संभव हुई। एक ही झटके में इस्राइल ने अपने सबसे दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी (और हमास के प्रमुख संरक्षक) को बेआबरू कर दिया। उसने न केवल मुल्लाओं से सीधे मुकाबला करने में अपनी क्षमता का, बल्कि उनके प्रतिशोधों से सुरक्षित बचने के साहस का भी प्रदर्शन किया। इसने सऊदी अरब के सामने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया, जो अब अब्राहम समझौते में शामिल होने के लिए ज्यादा इच्छुक हो सकता है-शांति की सौम्य इच्छा से नहीं, बल्कि यहूदी राज्य के साथ सैन्य, आर्थिक और तकनीकी संबंधों को मजबूत करने की दृढ़ इच्छा से। इसने कम से कम यह संभावना तो पैदा की कि ईरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को फिर से नष्ट होते देखने के डर से उसे त्यागने का फैसला कर सकता है। और इस जीत ने नेतन्याहू को अपने अति-दक्षिणपंथी गठबंधन सहयोगियों पर बढ़त दिला दी, जिससे उन्हें एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने का मौका मिला, जिससे शायद उनकी सरकार नहीं गिरेगी।
इस्राइली नीति के आलोचकों का तर्क है कि उसकी सैन्य जीत की कीमत विश्व मंच पर उसके अलग-थलग पड़ने या जोहरान ममदानी और टकर कार्लसन जैसे लोगों द्वारा उसके प्रति की गई अवमानना में निहित है। इसमें संदेह नहीं है कि इस्राइल के प्रति नफरत ने यहूदी-विरोध को बढ़ाने में काफी योगदान दिया है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस्राइल के प्रति नफरत की जड़ में यहूदी-विरोध ही है। फिर भी, इस्राइल का अस्तित्व अपने आलोचकों को संतुष्ट करने के लिए नहीं है। उसका अस्तित्व ऐसी दुनिया में यहूदी जीवन की रक्षा करने और यहूदी गरिमा को बनाए रखने लिए है, जो इन दोनों को नष्ट करने पर आमादा है। यदि कूटनीति के सफल होने की अब कोई संभावना है, तो वह इसलिए है, क्योंकि भू-राजनीति में जीवन की तरह विजेता बनना लाभदायक होता है।