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स्वागत 2025: हम इस धरती पर स्थायी यात्री नहीं हैं... अच्छा बनें और अच्छाई पर भरोसा करें

नंदितेश निलय स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक Published by: Nanditesh Nilay Updated Wed, 01 Jan 2025 04:54 AM IST

सार

बर्ट्रेंड रसेल का भी मानना था कि जो अच्छाई होती है, वह खुशी और ज्ञान के साथ आती है। इसलिए हम यह कामना करें कि 2025 एक ऐसा वर्ष हो, जो हमारे भीतर और आसपास अच्छाई को और बढ़ा सके।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


यह भी सच है कि हर साल की तरह नए साल में भी लाखों लोगों के लिए उम्मीद और खुशी की वह हवा जल्दी ही मद्धिम-सी पड़ने लगती है। जनवरी के अंतिम सप्ताह के आते-आते, दुनिया फिर से अजीब हो जाती है और डिजिटल दुनिया, जो हैप्पी न्यू ईयर से भरी हुई होती है, आसानी से डिलीट बटन भी पा लेती है। क्यों? क्योंकि एक उदासीन समाज के लिए एक इन्सान के साथ एक प्राणी की तरह व्यवहार करना आसान नहीं होता है। वह इन्सान यह मानता है कि यह फॉरवर्ड शुभकामनाएं असली हैं और इससे भी अधिक यह विश्वास करता है कि फोन उससे बात कर रहा है और साथ ही उसे सिरी, एलेक्सा, चैटजीपीटी और जेमिनी अच्छी तरह से समझते हैं। अंत में सारे मैसेज डिलीट हो जाते हैं। धीरे-धीरे वह पुरानी, घृणा, ईर्ष्या, जटिलता, स्वार्थ, असुरक्षा और दुनिया पर राज करने का भ्रम उस पर हावी होता जाता है। इसलिए इस नए साल में हम गुड न्यू ईयर की शुभकामना दें और अच्छे इन्सान बने रहने का सफर जारी रखें। बर्ट्रेंड रसेल का भी मानना था कि जो अच्छाई होती है, वह खुशी और ज्ञान के साथ आती है। इसलिए हम यह कामना करें कि 2025 एक ऐसा वर्ष हो, जो हमारे भीतर और हमारे आसपास अच्छाई को व बढ़ा सके तथा खुद के लिए भी एक अच्छी स्थिति का निर्माण कर सके। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि अच्छा करना और अच्छा बनना ही जीवन का उद्देश्य होता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था, ‘यदि भारत से अंग्रेज चले गए, तो उनके द्वारा बनाई गईं सभी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी और भारत मध्य युग की बर्बरता में वापस चला जाएगा।’ लेकिन चर्चिल भारत और उसके नेतृत्व को नहीं समझ पाए। जब दुनिया महामारी के संकट में थी, तब भारत ने न केवल टीके तैयार किए, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि एक अच्छे राष्ट्र की तरह वह सबसे पहले अपने वरिष्ठ नागरिकों का टीकाकरण करे और यहां तक कि उन देशों को भी टीके भेजकर मदद के लिए हाथ बढ़ाया, जो जीवित रहने के समान रूप से हकदार थे। यह मूल्यों के साथ अच्छाई की अभिव्यक्ति थी और भारत द्वारा की गई सबसे अच्छी मानवीय पहलों में से एक।


दार्शनिक और राजनेता सिसरो मानवतावाद में विश्वास करते थे। क्या हम, एक देश-एक चुनाव के आह्वान के बीच, एक देश-एक इन्सान की शुभकामना भी दे पाएंगे? क्या हम वर्ष 2025 को अच्छाई के उस चश्मे से देख पाएंगे? क्या जनवरी से दिसंबर तक हम वह अच्छा इन्सान बने रह पाएंगे, जो उस स्टोइक शांति से जीवन के युद्ध को जीत पाए? हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां रूपक मानवीय यादों से ज्यादा शक्तिशाली हैं, जहां हम सभी नाजुक यादों से जूझ रहे हैं, तो फिर खुद के लिए और दूसरों के लिए अच्छा कैसे बने रहें? मुझे यकीन है कि चैटजीपीटी और मेटा ने जवाब ढूंढ लिया होगा और वह दिन दूर नहीं जब एक रोबोट हैप्पी न्यू ईयर कार्ड के साथ कॉल बेल दबा रहा होगा।


हम इस धरती पर स्थायी यात्री नहीं हैं और एआई के स्वायत्त निर्णय लेने से हमें काफी चुनौती मिलती है। फिर भी हमें खुश रहने और शांति से जीने के लिए दुनिया भर में अच्छे छात्रों, शिक्षकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों, न्यायाधीशों, राजनेताओं, पत्रकारों, अधिकारियों, नागरिकों की आवश्यकता है। महान रस्किन ने हमें यह कहकर सावधान किया कि सभी बौद्धिक पेशेवरों का कर्तव्य है कि वे उचित अवसर पर अपने कर्तव्य को पूरा करने को अपना लक्ष्य बनाएं। इसका मतलब है उद्देश्य के लिए जीना और उद्देश्य ही मानवता है। इसलिए अच्छाई के लिए जीना ही नए साल की शुभकामना होनी चाहिए। आइए, इस उम्मीद के साथ नए साल का स्वागत करें, ‘अगर सर्दी आती है, तो क्या वसंत बहुत दूर रह सकता है?’ एक बार फिर, शुभ नव वर्ष, पाठकों। अच्छा बनें और अच्छाई पर भरोसा करें।  edit@amarujala.com

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