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जीवन धारा: ऐसा स्पर्श बनूं कि किसी को चोट न पहुंचे... हमें अपने आंसुओं पर कभी शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं

चार्ल्स डिकेंस Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 01 Jan 2025 04:49 AM IST

सार

चारों ओर छाए अंधेरे के बीच मेरे मन में एक प्रार्थना-सी गूंजी कि इस नव वर्ष में ऐसा हृदय रखूं, जो कभी कठोर न हो, ऐसा स्वभाव रखूं, जो सभी को माफ करे और ऐसा स्पर्श रखूं, जो कभी चोट न पहुंचाए।
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चार्ल्स डिकेंस - फोटो : अमर उजाला


इसलिए रो बेशक लीजिए, लेकिन यह ध्यान में रखते हुए कि यह अवसर साल में एक ही बार आता है, ज्यादातर लोगों की तरह मौज-मस्ती करते हुए आने वाले साल का आह्वान करना भी सीखिए। पिछले साल कुछ ऐसी घटनाएं, तो अवश्य हुई होंगी, जिन्हें याद करके हमें खुशी होती होगी और हम मन-ही-मन मुस्कराते हुए भगवान को नमन करके धन्यवाद देते होंगे कि प्रभु ने हमारे ऊपर ऐसी कृपा की। मैं इस बार सन 1886 में इसे अपने घर में आग के सामने बैठे इस लेख को लिख रहा हूं। ऐसे जैसे कि कोई असाधारण घटना नहीं घटी है, न अगले साल घटने वाली है, जिससे हमारा मिजाज, जो अभी खुशी से भरपूर है, वह खराब होगा, बिगड़ जाएगा। घोड़ा-गाड़ियां अच्छी तरह से सजे-धजे लोगों को इधर से उधर निस्संदेह पार्टियों में ले जा रही थीं।


सड़क के दूसरी ओर दरवाजे पर दो बार खट-खट हुई और उस घर के दरवाजे, जहां हरे रंग के परदे पड़े थे, खुले और कई लोग उसमें जल्दी से घुस गए। इससे लोगों को पता चल गया कि उस घर में कोई बड़ी पार्टी थी। हमने भी खिड़की में से परदा हटाकर देखा, घने कोहरे के बीच से अंदर देखने की कोशिश की। जहां पर उस रात को नव वर्ष के आगमन पर आयोजन होना था। चारों ओर अंधेरा छाया था, तभी मेरे मन में एक प्रार्थना रोशन हुई कि इस नव वर्ष में ऐसा हृदय रखूं, जो कभी कठोर न हो, ऐसा स्वभाव रखूं, जो सभी को माफ करे और ऐसा स्पर्श रखूं, जो कभी किसी को चोट न पहुंचाए।

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