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हम पृथ्वी के कर्ज पर जी रहे हैं, प्राकृतिक संसाधनों का अग्रिम दोहन हो रहा है इसकी भारपाई हमें ही करनी पड़ेगी

राम यादव
Updated Sun, 30 Aug 2020 11:17 AM IST
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Natural Resources - फोटो : iStock

दुनिया के लगभग हर देश की सरकार करों आदि से होने वाले अपने राजस्व से अधिक खर्च करती है। अपने अतिरिक्त खर्च के लिए उसे ऋण लेने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, भारत की सरकारों द्वारा लिए गए ऋण, भारत के हर नागरिक पर इस समय औसतन 1,400 डॉलर से भी अधिक बैठते हैं। एक डॉलर इस समय लगभग 75 रुपये के बराबर है।



पर, क्या आपने सुना है कि पैसों की ही तरह दुनिया का हर देश अपने प्राकृतिक संसाधनों को भी अपनी औकात से अधिक खर्च कर रहा है! हर वर्ष कई-कई महीनों के बराबर पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का अग्रिम दोहन होता है। इस उधारी की भरपाई अंततः कभी न कभी और किसी न किसी रूप में हमें ही करनी पड़ेगी।



इस वर्ष शनिवार, 22 अगस्त वह दिन था, जब दुनिया पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की वह समय-सीमा लांघ गई, जिसके बाद अब 2020 के बाकी दिनों और महीनों में उधारी पर जीने का समय शुरू हो गया है। दूसरे शब्दों में, इस दिन तक हम पृथ्वी-वासियों ने अपने जीने-रहने के लिए प्रकृति से मिलने वाले वे सारे आवश्यक संसाधन सवा तीन महीने पहले ही खपा दिए, जिन्हें पुनः पैदा करने करने के लिए पृथ्वी को पूरा एक वर्ष चाहिए। गनीमत यह रही कि कोरोना वायरस के विश्वव्यापी प्रकोप ने आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों को जिस तरह और जितने लंबे समय तक ठप रखा, उसकी कृपा से उधारी पर जीने का यह ऋणकाल, इस वर्ष पूर्वानुमान से करीब साढ़े तीन महीने देर से शुरू हुआ है।


कोरोना का प्रकोप यदि नहीं होता, तो मूल गणना के अनुसार अंग्रेजी में 'अर्थ ओवरशूट डे' या 'इकोलॉजिकल डेट डे' कहलाने वाला यह दिन, जिसे हम हिंदी में 'प्राकृतिक संसाधन सीमालंघन दिवस' कह सकते हैं, तीन मई को पड़ता। पिछले वर्ष, यानी 2019 में यह दिन 29 जुलाई को पड़ा था। 'अर्थ ओवरशूट डे' किसी वर्ष का वह दिन, जिस दिन मानवजाति पृथ्वी पर के उन सभी प्राकृतिक संसाधनों को खपा चुकी होगी, जिन्हें हमारी पृथ्वी पूरे एक साल का समय लेकर ही पुनः पैदा कर पाएगी।


यह अवधारणा मूल रूप से ब्रिटेन के 'न्यू इकनॉमिक फाउन्डेशन' कहलाने वाले एक 'थिंक टैंक' के एन्ड्रियू सिमन्स की देन है। इस अवधारणा के नियमों के आधार पर 'ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क' नाम की एक संस्था हर वर्ष विश्व भर में उन प्राकृतिक संसाधनों व सेवाओं की मांग और पूर्ति का आकलन करती है, जो मनुष्यजाति को चाहिए। उसने पाया कि इस बीच करीब सात महीनों में ही वे सारे पुनरुत्पादी संसाधन खप जाते हैं और वह सारी कार्बन-डाइऑक्साइड पैदा हो जाती है, जिसे वास्तव में वर्ष के अंत में कभी होना चाहिए।


विगत 25 वर्षों से यही देखने में आ रहा है कि हमारी जरूरतों में लगने वाले विश्व के पुनरुत्पादी साधनस्रोत, बढ़ती हुई गति के साथ, वर्ष के अंत से कहीं पहले ही खप जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, 1993 में खपत की सीमा को पार करने वाला यह सीमालंघन दिवस 21 अक्टूबर था, जो 2003 में 22 सितंबर और 2019 में 29 जुलाई हो गया। इस दिन के बाद साल बीतने तक के बाकी के सारे महीने उधार पर जीने के समान थे।


मांग और पूर्ति के रूप में धरती से मिलने वाली खाने-पीने और रहने-सहने के लिए आवश्यक वस्तुओं के अलावा वनों, विभिन्न आवश्यकताओं के लिए जमीनों, जलस्रोतों, समुद्री संसाधनों, खनिज पदार्थों, कूड़े-कचरे और पर्यावण प्रदूषक गैसों के प्रभावों को भी इस गणना में शामिल किया जाता है। इस सबके आधार पर यह हिसाब भी लगाया जाता है कि उदाहरण के लिए, 2020 के पूरे वर्ष में, विश्व की जनसंख्या की जो अनुमानित मांग है, उसे यदि इसी वर्ष पूरा करना हो, तो हमारे पास हमारी पृथ्वी-जैसी ही कितनी और जगह, या कितनी और पृथ्वियां होनी चाहिए।
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पाया गया कि 2020 की सारी जरूरतें 2020 में ही पूरा करने के लिए हमें अपनी इस समय की पृथ्वी से 60 प्रतिशत बड़ी कोई दूसरी पृथ्वी मिलनी चाहिए। यही नहीं, यदि हमारी मांगें और विश्व की जनसंख्या आज की तरह ही बढ़ती रहीं, तो 2050 आने तक हमारी पृथ्वी पर जनसंख्या 10 अरब हो जाएगी, और तब हमें अपनी इस समय की पृथ्वी जैसी कुल तीन पृथ्वियों की जरूरत पड़ेगी! जर्मनी की पर्यावरणवादी संस्था 'जर्मन वॉच' ने हिसाब लगाया है कि विश्व के दूसरे देश भी यदि जर्मनों की तरह रहने और अपनी अर्थव्यवस्था चलाने लगें, तो हमें अभी ही तीन पृथ्वियां, और अमेरिका की तरह रहने के लिए पांच पृथ्वियां चाहिए।


'अर्थ ओवरशूट डे' वास्तव में सरकारों और जनसाधारण को जगाने एवं चेताने का ही एक अलग अभियान है। उद्देश्य है, सबके गले उतारना कि हमारी पृथ्वी इस समय के हमारे खर्चीले जीवन-ढर्रे का और हमारी अदूरदर्शी अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ता हुआ बोझ लंबे समय तक संभाल नहीं सकती। हम अपने भविष्य की कीमत पर जी रहे हैं। कोरोना वायरस का प्रकोप चाहे जितना कष्टदायक हो, उसने विश्व


स्तर पर कम से कम यह तो दिखाया ही है कि यदि हम अपने वर्तमान में कुछ कम खपत से अपना काम चला सकें, संसाधनों की अभी से बचत कर सकें, तो अपने भविष्य को उसी अनुपात में बढ़ा कर लंबा और बेहतर बना सकते हैं।

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