अंग्रेजी की एक कहावत है, जिसे हम पत्रकार अक्सर गंभीरता से लेते हैं। कहावत है : गुड न्यूज इस नो न्यूज। यानी अच्छी खबर कभी खबर नहीं बनती है। लेकिन पिछले सप्ताह जब थाईलैंड की उस अंधेरी गुफा से बारह किशोरों और उनके कोच को सुरक्षित निकाला गया, तो सारी दुनिया में यह खबर सुर्खियों में रही।
उन किशोरों के उस गुफा में फंस जाने के बाद उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए कई देशों से विशेषज्ञ पहुंचे, तब भी जब ऐसा लग रहा था कि उनका जीवित होना असंभव है। दो अंग्रेज गोताखोरों ने घंटों अंधेरी सुरंगों में खोजने के बाद उन्हें ढूंढा। इसके बाद असली कठिनाइयां आन पड़ीं।
वे किशोर और उ नके कोच जीवित तो थे, लेकिन उनको निकाला कैसे जाता, जब उनमें से कुछ तैरना भी नहीं जानते थे। कुछ विशेषज्ञों की राय थी कि जब तक बरसात का मौसम बीत न जाए, तब तक उनको गुफा के अंदर रहने देना चाहिए।
लेकिन जब मूसलाधार बारिश होने लगी और गुफा में पानी भरने लगा, तब तय किया गया कि जितनी जल्दी उनको निकाला जाए, उतना अच्छा होगा। सो तमाम खतरे झेलकर थाईलैंड की नौसेना के बहादुर ‘सील’ ने अंतरराष्ट्रीय गोतखोरों की सहायता से सबको सुरक्षित निकाल कर दिखाया। मैंने उन किशोरों के गायब होने के पहले दिन से यह पूरी कहानी सीएनएन और बीबीसी पर लगातार इसलिए भी देखी कि थाईलैंड एक ऐसा देश है, जहां मैं लगातार वर्षों से जाती रही हूं।
निजी तौर पर मुझे उस देश के प्रति विशेष रुचि इसलिए भी है, क्योंकि जब मैं पहली बार 1978 में थाईलैंड गई थी, तो उसका हाल बिल्कुल भारत जैसा हुआ करता था। बैंकॉक और मुंबई में कोई अंतर नहीं था। वही गंदगी, वही टूटी-पुरानी आम सेवाएं और वही माफिया किस्म के लोगों का बोलबाला। आज थाईलैंड विकास के पैमाने पर हमसे आगे निकल चुका है।
गुफा से निकालकर उन बच्चों को जब चांग्राई के अस्पताल में लाया गया, तो वह अस्पताल देखकर ही मैं हैरान रह गई। वह किसी विकसित पश्चिमी देश का अस्पताल लगता था। ऐसे सरकारी अस्पताल मुंबई और दिल्ली में भी नहीं हैं। उस अस्पताल के आईसीयू में जैसा इलाज अब बच्चों को मिल रहा है, वैसा इलाज शायद ही भारत के किसी सरकारी अस्पताल में उपलब्ध होगा।
और तो और, हमारे सबसे अच्छे निजी अस्पताल के पास ऐसे एंबुलेंस भी नहीं हैं, जो बच्चों को गुफा से अस्पताल तक पहुंचाने में काम आए थे। कहने का मतलब स्पष्ट कर दूं-अगर भारत में ऐसी घटना घटी होती, तो बच्चे गुफा के अंदर ही भूख से मर गए होते। मजे की बात यह है कि बच्चों की आशा जीवित रखने में, उनके हौंसले बुलंद रखने में, उनके कोच ने खास भूमिका अदा की, क्योंकि वह कभी लामा हुआ करते थे, सो जानते थे राजयोग के तरीके।
सो भारत की प्राचीन विद्या एक ऐसे देश में काम आई, जो कभी हमसे पीछे हुआ करता था और जो अब हमसे आगे निकल गया है। मेरी राय में भारत केवल इसलिए पीछे रह गया है, क्योंकि हमारी सरकारों ने अपनी और अपने परिवार की सेवा पर अधिक ध्यान दिया है और जनता की सेवा पर कम। इस बुरी आदत को बदलने में अभी समय लगेगा, क्योंकि हमारे जनप्रतिनिधि अब भी अपने आप को राजा समझते हैं, जनता के सेवक नहीं। जिस दिन वे अपने आप को जनता का सेवक समझने लगेंगे, उस दिन उनकी नजर उन बेकार आम सेवाओं की तरफ जाएगी, जिन पर आम भारतीय निर्भर हैं।
जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में हम बड़े पैमाने पर परिवर्तन नहीं ला पाते हैं, तब तक विकास की आशा करना मूर्खता है।