रामकृष्ण परमहंस शास्त्रों के सभी नियमों का पालन करते हुए तोतापुरी जी के शिष्य बन गए। गुरु शिष्य मर्यादा के अनुसार दीक्षा देने के बाद तोतापुरी जी उन्हें उपदेश देते। परमहंस की आंतरिक स्थिति उत्कट स्तर की थी। एक दिन तोतापुरी ने उनसे कहा, अब तुम अपने मन को निर्विकल्प करो और उसे आत्मचिंतन में लगाओ।
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रामकृष्ण बोले, लेकिन जब मैं ध्यान करने बैठता हूं, तो लाख कोशिश करने के बाद भी मन को निर्विकल्प नहीं कर पाता। तोतापुरी जी इस बात पर नाराज हो गए और उन्होंने गुस्से में कहा, क्यों नहीं कर सकते? यह कहकर वह कुटिया के अंदर चारों ओर देखने लगे। उनकी नजर कांच के एक टुकड़े पर पड़ी। उन्होंने उसे तुरंत उठा लिया। उसे उलट-पलट कर देखा और उसके नुकीले अग्रभाग को रामकृष्ण की भौहों के बीच में लगभग गड़ाया और बोले, इस बिंदु में अपने मन को समेट लो।
रामकृष्ण पुनः समाधि में बैठे और तोतापुरी जी उन्हें उसी अवस्था में छोड़कर कुटिया से बाहर चले गए। समय बीतता गया। धीरे-धीरे तीन दिन और तीन रातें बीत गईं। तोतापुरी ने सारा समय इंतजार में गुजार दिया, लेकिन न तो रामकृष्ण वहां से उठे और न ही उन्होंने पुकारा। आखिरकार तोतापुरी जी ने दरवाजा खोलकर अंदर देखा, तो पाया कि रामकृष्ण तो अब भी वैसे ही बैठे हैं, जैसा उन्हें छोड़ गए थे।
उन्होंने छूकर देखा, तो शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। लेकिन रामकृष्ण के चेहरे पर पहले से ज्यादा तेज था। तोतापुरी मंत्रमुग्ध से उन्हें देखते रह गए। उन्होंने मन ही मन रामकृष्ण को प्रणाम किया और वहां से चले गए। काफी समय बाद रामकृष्ण परमहंस की समाधि खुली। तोतापुरी ने शिष्य को छुआ और कहा, तुम तो खरा सोना निकले भगत।