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वैक्सीन का इंतजार

तस्लीमा नसरीन
Updated Thu, 16 Apr 2020 03:29 PM IST
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वैक्सीन का इंतजार (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

चीन का कहना है कि कोरोना वायरस से वुहान में मात्र ढाई हजार लोग मारे गए। लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वुहान में चालीस हजार से भी अधिक लोग मारे गए। यदि चीन कोरोना के बारे में सही तथ्य बताता, यदि वह कहता कि यह वायरस पूरी दुनिया में फैल जाएगा, यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन तटस्थ रहता, तब शायद चीन के बाहर की दुनिया, खासकर यूरोप और अमेरिका पहले से सतर्क हो जाते। सतर्क न होने के कारण ही आज इटली, स्पेन और अमेरिका में मृत्यु का तांडव हो रहा है।

पूरी दुनिया के आशंकित लोग आज घर में बैठ गए हैं। इस तरह तो वैश्विक अर्थव्यवस्था ढह जाएगी। इसी के कारण इम्युनिटी पासपोर्ट की बात कही जा रही है। जो लोग कोरोना वायरस से लड़ाई में जीत चुके हैं, उनके शरीर में एंटी बॉडी जांच कर यह देखने की कोशिश हो रही है कि उनमें इस वायरस का दोबारा शिकार होने की आशंका है या नहीं।



अगर आशंका न हो, तो उनके लिए इम्युनिटी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। इस पासपोर्ट के जरिए वे बाहर का काम कर सकेंगे और जिनके अंदर यह इम्युनिटी नहीं है, उन्हें घर में ही तब तक बैठना पड़ेगा, जब तक कोविड-19 का टीका न आ जाए।

डरी-सहमी हुई पृथ्वी को देखकर यह सवाल उठता है कि मृत्यु के इस तांडव को क्या रोका नहीं जा सकता था। वुहान में जब लोग संक्रमित हो रहे थे, उसी समय चीन में बाहरी दुनिया के प्रवेश को अगर प्रतिबंधित कर दिया जाता, तो यह वायरस चीन से बाहर नहीं फैल पाता। उस दौरान बहुत सारे देश चीन में फंसे अपने नागरिकों को अपने यहां ले आए थे।

गरीब लोगों से लेकर संभ्रांत तक इसके शिकार हैं

राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ तब वायरस भी उन देशों की सीमाओं में प्रवेश कर चुका था। तब कई लाख लोग चीन से निकलकर दुनिया भर में फैल गए। दुनिया आज उसी की कीमत चुका रही है। मनुष्य की गलती के कारण ही मनुष्य आज मृत्यु के इस तांडव को देखने के लिए विवश है।

यह वायरस अमीर-गरीब, गोरे-काले, हिंदू-मुसलमान- सिख-ईसाई आदि का भेद नहीं मानता। गरीब लोगों से लेकर संभ्रांत तक इसके शिकार हैं। ब्रिटिश राजकुमार, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, इस्राइल के स्वास्थ्य मंत्री इससे संक्रमित हैं। न्यूयॉर्क आज मृत्यु की नगरी बन चुका है, जहां मारे जाने वालों में अनेक बांग्लादेशी भी हैं। जो वायरस सिर्फ छींकने या खांसने से नहीं, बात करने से भी फैलता है और छह मीटर दूर तक फैल सकता है, उसे निर्मूल करने के तरीके के बारे में आज किसी को पता नहीं है।

हम सब इस वायरस से संक्रमित हो सकते हैं। एक विशेषज्ञ ने बहुत पहले कहा था कि 80 फीसदी लोग इससे संक्रमित होंगे। इससे बचने का हमारे सामने क्या उपाय है? वैक्सीन है। लेकिन वैक्सीन आने में लगभग डेढ़ साल लगेंगे। हमारे पास उस वैक्सीन के आने में न जाने और कितना समय लगेगा। लेकिन जिनकी उम्र अधिक है, जो डाइबिटीज और उच्च रक्तचाप के मरीज हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है, उन्हें तो लॉकडाउन के दौरान खासकर बहुत सावधानी के साथ रहना पड़ेगा। पर अगर तब भी यह वायरस किसी तरीके से हमें संक्रमित कर डाले, तो?

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वैक्सीन का इंतजार (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
चीन का कहना है कि कोरोना वायरस से वुहान में मात्र ढाई हजार लोग मारे गए। लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वुहान में चालीस हजार से भी अधिक लोग मारे गए। यदि चीन कोरोना के बारे में सही तथ्य बताता, यदि वह कहता कि यह वायरस पूरी दुनिया में फैल जाएगा, यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन तटस्थ रहता, तब शायद चीन के बाहर की दुनिया, खासकर यूरोप और अमेरिका पहले से सतर्क हो जाते। सतर्क न होने के कारण ही आज इटली, स्पेन और अमेरिका में मृत्यु का तांडव हो रहा है।

पूरी दुनिया के आशंकित लोग आज घर में बैठ गए हैं। इस तरह तो वैश्विक अर्थव्यवस्था ढह जाएगी। इसी के कारण इम्युनिटी पासपोर्ट की बात कही जा रही है। जो लोग कोरोना वायरस से लड़ाई में जीत चुके हैं, उनके शरीर में एंटी बॉडी जांच कर यह देखने की कोशिश हो रही है कि उनमें इस वायरस का दोबारा शिकार होने की आशंका है या नहीं।

अगर आशंका न हो, तो उनके लिए इम्युनिटी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। इस पासपोर्ट के जरिए वे बाहर का काम कर सकेंगे और जिनके अंदर यह इम्युनिटी नहीं है, उन्हें घर में ही तब तक बैठना पड़ेगा, जब तक कोविड-19 का टीका न आ जाए।

डरी-सहमी हुई पृथ्वी को देखकर यह सवाल उठता है कि मृत्यु के इस तांडव को क्या रोका नहीं जा सकता था। वुहान में जब लोग संक्रमित हो रहे थे, उसी समय चीन में बाहरी दुनिया के प्रवेश को अगर प्रतिबंधित कर दिया जाता, तो यह वायरस चीन से बाहर नहीं फैल पाता। उस दौरान बहुत सारे देश चीन में फंसे अपने नागरिकों को अपने यहां ले आए थे।

गरीब लोगों से लेकर संभ्रांत तक इसके शिकार हैं

राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ तब वायरस भी उन देशों की सीमाओं में प्रवेश कर चुका था। तब कई लाख लोग चीन से निकलकर दुनिया भर में फैल गए। दुनिया आज उसी की कीमत चुका रही है। मनुष्य की गलती के कारण ही मनुष्य आज मृत्यु के इस तांडव को देखने के लिए विवश है।

यह वायरस अमीर-गरीब, गोरे-काले, हिंदू-मुसलमान- सिख-ईसाई आदि का भेद नहीं मानता। गरीब लोगों से लेकर संभ्रांत तक इसके शिकार हैं। ब्रिटिश राजकुमार, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, इस्राइल के स्वास्थ्य मंत्री इससे संक्रमित हैं। न्यूयॉर्क आज मृत्यु की नगरी बन चुका है, जहां मारे जाने वालों में अनेक बांग्लादेशी भी हैं। जो वायरस सिर्फ छींकने या खांसने से नहीं, बात करने से भी फैलता है और छह मीटर दूर तक फैल सकता है, उसे निर्मूल करने के तरीके के बारे में आज किसी को पता नहीं है।

हम सब इस वायरस से संक्रमित हो सकते हैं। एक विशेषज्ञ ने बहुत पहले कहा था कि 80 फीसदी लोग इससे संक्रमित होंगे। इससे बचने का हमारे सामने क्या उपाय है? वैक्सीन है। लेकिन वैक्सीन आने में लगभग डेढ़ साल लगेंगे। हमारे पास उस वैक्सीन के आने में न जाने और कितना समय लगेगा। लेकिन जिनकी उम्र अधिक है, जो डाइबिटीज और उच्च रक्तचाप के मरीज हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है, उन्हें तो लॉकडाउन के दौरान खासकर बहुत सावधानी के साथ रहना पड़ेगा। पर अगर तब भी यह वायरस किसी तरीके से हमें संक्रमित कर डाले, तो?

चीन में इस समय कोरोना संक्रमण के मामले कम होने लगे हैं। दूसरी ओर, अमेरिका में कोरोना संक्रमितों की संख्या भयावह तेजी के साथ बढ़ रही है। चीन जो काम कर पाया, अमेरिका और यूरोप वह काम क्यों नहीं कर सका? तो क्या कोरोना के बाद चीन ही विश्व शक्ति होगा? अमेरिका की स्थिति यह है कि आज वह अपने नागरिकों को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।

अमेरिका की मदद के लिए चीन आगे आया है। चीन यूरोपीय देशों की भी मदद कर रहा है। अगर चीन शुरुआत में ही दुनिया को इस वायरस की सच्चाई के बारे में बता देता या यूरोप व अमेरिका वायरस का प्रवेश रोकने की हरसंभव कोशिश करते, तो आज इसकी नौबत नहीं आती।

अमेरिका ने साइंस फिक्शन पर अनेक फिल्में बनाई हैं। उन साइंस फिक्शन्स में दिखाया गया है कि भिन्न ग्रहों से एलियन्स आकर हमारे ग्रह पर हमला करते हैं या बैक्टीरिया या वायरस फैलाकर पूरी सृष्टि को तबाह करते हैं। तब पृथ्वी को कौन बचाता है? आज वायरस से संक्रमित होकर अमेरिका में हजारों लोग मारे जा रहे हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति रोज अर्थहीन प्रलाप कर रहे हैं। पैसे से नहीं, बल्कि इम्युनिटी के जरिए ही इस वायरस से बचा जा सकता है। बाकी लोग मारे जाएंगे।
 
यह एक नई पृथ्वी है। लेकिन हताशा और निराशा के बीच भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। उम्मीद के बगैर पृथ्वी अंधेरी है। अच्छी बात यह है कि वैक्सीन की खोज हो चुकी है। बस इसका परीक्षण शेष है। परीक्षणों के बाद वैक्सीन हमारे पास होगी। यह भी शुक्र मनाना चाहिए कि यह वायरस हवा में नहीं रहता। सिर्फ संक्रमित व्यक्ति के नजदीक जाने से ही संक्रमण का खतरा होता है। और यह भी कम सुखद और उम्मीद भरा नहीं है कि अब भी दुनिया में अनेक ऐसे वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने मानवता को खतरनाक वायरसों से बचाया है, और वे अब भी हमें बचाने के काम में लगे हुए हैं।

भारत में कोविड-19 का संक्रमण इतना नहीं बढ़ता, अगर तब्लीगी जमात में देसी-विदेशी लोगों का इतना जमावड़ा न होता। ऐसे में, तब्लीगी जमात पर लोगों का गुस्सा स्वाभाविक है। मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि धर्मांध और कट्टर लोगों ने इस पृथ्वी को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।

ऐसा सिर्फ बांग्लादेश या भारत में नहीं, दुनिया में हर कहीं हो रहा है। अमेरिका के लुसियाना में टॉम स्पेल नाम के धर्मगुरु ने चेतावनी के बाद भी गिरजाघर खुला रखा, जहां अनेक लोग इकट्ठा हुए। उन्होंने कहा कि वह लॉकडाउन नहीं मानते। ऐसे ही इस्राइल के स्वास्थ्य मंत्री ने सिनेगॉग खोलकर लोगों को इकट्ठा किया और कहा कि प्रार्थना करने से कोरोना नहीं होगा। अब वह खुद संक्रमित हैं।  

कोरोना के बाद की दुनिया कैसी होने वाली है? जाहिर है, आने वाले समय में देश हथियारों पर नहीं, स्वास्थ्य पर खर्च करने को वरीयता देंगे। हथियारों के सहारे जीवित नहीं रहा जा सकता, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के सहारे जिया जा सकता है।    
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