बांग्लादेश पिछले साल भर से लहूलुहान है। वहां पाकिस्तानपरस्त जमाते इस्लामी के खिलाफ सरकार की कार्रवाई से कट्टरपंथी हिंसा की जो शुरुआत हुई थी, वह अब्दुल कादिर मुल्ला को फांसी देने के बाद और तेज हो गई। अब जैसे ही जनवरी में चुनाव होने की घोषणा हुई है, यह आशंका प्रबल होती जा रही है कि सर्वनाशक हिंसा का एक नया दौर भी आरंभ हो सकता है। पहले से ही कट्टरपंथी लोग निर्दोष नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। सीमावर्ती इलाके में बसे अल्पसंख्यक हिंदू खासकर उनके निशाने पर हैं। पटरियों पर तोड़-फोड़ के कारण रेलगाड़ियां दुर्घटनाग्रस्त हो रही हैं-बसें जलाई जा रही हैं और रोजाना के बंद के कारण आर्थिक काम-काज ठप हैं। इस पड़ोसी देश में राजनीतिक अस्थिरता बेहद चिंताजनक है।
पांच साल पहले शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग भारी बहुमत से जीतकर सत्ता में आई थी। शेख हसीना ने 1971 के नरसंहार में पाक सेना का साथ देने वाले युद्ध अपराधियों का बेरहमी से उन्मूलन किया है, जिसे नाजायज नहीं कहा जा सकता। वे लोग भी शेख हसीना के निशाने पर रहे हैं, जो उस तख्तापलट की साजिश में शामिल थे। इन्हीं लोगों ने उनके पिता बंगबंधु शेख मुजीब की सपरिवार हत्या कर नवोदित बांग्लादेश को फिर से फौजी तानाशाही के अधीन कर डाला था। हसीना का मानना है कि इन्साफ के इस तकाजे को ठुकरा कर उनका देश कभी भी स्थायी शांति हासिल नहीं कर सकता। जबकि उनके आलोचकों का कहना है कि गड़े मुर्दे चैन से सो सकें, इसके लिए वह ताजा खून बहाने को राजी हैं।
इसमें शक नहीं कि 'शांति और सुलह’ की तलाश में जो रास्ता हसीना ने अपनाया है, उससे पूरी तरह एकमत नहीं हुआ जा सकता; यह रास्ता दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला के रास्ते से भी भिन्न है, पर सभ्य समाज में कट्टरपंथियों के लिए आखिर कितनी जगह होनी चाहिए? अंतरराष्ट्रीय मीडिया यह प्रचारित करने में व्यस्त है कि शेख हसीना भले ही आगामी चुनाव जीत जाएं, पर वह देश को गृहयुद्ध के कगार पर पहुंचा कर अपना इकबाल गंवा चुकी हैं। उसकी भारत से भी यह शिकायत है कि वह बांग्लादेश पर हिंसा रोकने के लिए जरूरी दबाव नहीं डाल रहा। ऐसे विश्लेषकों का भी अभाव नहीं, जो कह रहे हैं कि आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ हसीना राजनीतिक संकट से अपने विरोधियों का ध्यान बंटाना चाह रही है, जो आत्मघाती हो सकता है।
हमारी समझ में इन सब मुद्दों पर ठंडे दिमाग से सोचने की जरूरत है। यह मसला मात्र सामरिक या राजनयिक संवेदनशीलता का नहीं, बल्कि अपनी धर्मनिरपेक्षता के साथ भी अभिन्न रूप से जुड़ा है। यदि शेख हसीना आर्थिक संकट का समाधान ढूंढने में विफल रही हैं, तो इसकी जिम्मेदारी अकेले उनकी नहीं। उनकी सरकार को नाकामयाब करने का हरसंभव प्रयास खालिदा जिया की पार्टी करती रही है। खालिदा उन्हीं जनरल जिया की पत्नी हैं, जो शेख मुजीब तथा जनतंत्र की हत्या के बाद बांग्लादेश के सदर बने थे। इस कुनबापरस्त विरासत के आधार पर वह अपने को उनका उत्तराधिकारी समझती हैं। उनकी पार्टी कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों का समर्थन करती तथा उनसे समर्थन लेती है। आर्थिक शोषण एवं सामाजिक उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार बांग्लादेशी श्रेष्ठिवर्ग के साथ उनके राजनीतिक दल का गहरा नाता है। अभाव और महंगाई जनित जनाक्रोश को भड़काने में उनके समर्थकों की बड़ी भूमिका नजर आती है।
इसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अमेरिका, सऊदी अरब और चीन जैसे देश खालिदा जिया और उनकी पार्टी के प्रति उदार, सहानुभूतिपूर्ण रवैया दिखाते रहे हैं। ये सभी चाहते हैं कि बांग्लादेश में ऐसी सरकार कतई न बने, जिसके भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते हों। यदि ऐसा होता है, तो दक्षिण एशिया में उनके सामरिक मंसूबे खटाई में पड़ जाएंगे। पाकिस्तान को वहाबी आक्रामक इस्लाम की पौधशाला बना चुकने के बाद सऊदी अरब की नजर अब बांग्लादेश पर है। यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से ईरानी संस्कृति का साझेदार रहा है और यहां का इस्लाम सूफीवाद से काफी प्रभावित रहा है। जब तक उसे अरब अनुदार सांचे में नहीं ढाल लिया जाता, तब तक उसके एकाधिकारी वर्चस्व को चुनौती मिलती रहेगी।
जबकि अमेरिका और चीन के लिए अस्थिर और अशांत दक्षिण एशिया बेहतर विकल्प है। चीन के पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते जग जाहिर हैं। जबकि अमेरिका का मानना है कि भारत को बांग्लादेश के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। इस बात की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बांग्लादेश के श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों का अमानवीय शोषण करने के लिए जो स्थानीय उद्यमी तथा पूंजीपति जिम्मेदार हैं, उनमें से अधिकांश मशहूर अमेरिकी कंपनियों के लिए सस्ता उत्पादन करने या कच्चा माल जुटाने के लिए बदनाम हैं।
बांग्लादेश को यह सलाह देना, कि वह 1971 के अपराधियों या 1975 की तख्तापलट के कातिलों को क्षमादान कर आगे की सोचे, उसकी संप्रभुता का तिरस्कार है। हमारी राय में यह अधिकार मात्र बांग्लादेश की जनता को है कि वह तय करे कि किसे मत देकर विजयी बनाना है और किसे असंतोष के कारण सत्ता से बाहर करना है! बांग्लादेश के जो राजनीतिक दल चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं, वे भी जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। एक बात निर्विवाद है कि विवादों का निपटारा संवाद से ही हो सकता है, हथियारबंद मुठभेड़ से नहीं। साथ ही, मजहबी कट्टरपंथी के साथ जनतंत्र नहीं निभ सकता। वास्तव में चुनावी नतीजों से अधिक चिंता हमें इन बुनियादी बातों की होनी चाहिए।