लालकृष्ण आडवाणी ने हाल ही में जो रवैया अपनाया, वह बहुत अप्रत्याशित नहीं है। पिछले सात-आठ वर्षों से पार्टी के भीतर उनकी छवि एक विवादास्पद नेता की बन गई है। इसकी शुरुआत 2005 से होती है, जब उन्होंने कराची में अपने एक भाषण में जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताया था।
अपना वह भाषण प्रेस में बंटवाने के लिए उन्होंने भाजपा के दिल्ली कार्यालय को भेजा था, जिसे पार्टी नेताओं ने रोक लिया था और जब वह लौटे, तो उन पर पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया और उन्हें इस्तीफा देना भी पड़ा था।
यह अलग बात है कि राजग के नेताओं को मनाकर पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवा लिया था, लेकिन पार्टी के अंदर उनकी विवादास्पद छवि तभी से बनी रही है।
अभी जो उन्होंने इस्तीफा सौंपा, उसकी वजह थी पार्टी द्वारा नरेंद्र मोदी को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान समिति का मुखिया बनाना। राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान की कमान स्वेच्छा से नहीं सौंपी, बल्कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले से ही देश भर के पार्टी कार्यकर्ताओं एवं नेताओं की ओर से यह मांग उठ रही थी।
पार्टी से अलग, बाबा रामदेव ने एक संत समागम करवाया था, जिनमें तमाम प्रतिष्ठित संतों ने भी मांग की थी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया जाए। उससे पहले कुंभ मेले में भी धार्मिक नेताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के समक्ष ऐसी ही मांग रखी थी।
मोदी के पक्ष में देश भर में उठ रही आवाज के मद्देनजर भाजपा प्रमुख को यह लगा कि नरेंद्र मोदी ही वह व्यक्ति हैं, जो लोकसभा चुनाव में पार्टी को अधिक सीट दिलवा सकते हैं, इसलिए उन्होंने असमंजस से उबरते हुए मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा की।
असल में 2003 से भाजपा में एक नई परिपाटी की शुरुआत हुई, जब उमा भारती वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं। उन्हें पार्टी ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की कमान सौंपी थी, लेकिन मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था। जब पार्टी वहां चुनाव जीत गईं, तो उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं।
उसी तरह अभी जब नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव की कमान सौंपी गई, तो मोदी विरोधी खेमे में यह खलबली मची कि कहीं परोक्ष रूप से उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में तो आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। जबकि भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। उसका फैसला तो चुनाव परिणाम के बाद होगा।
आडवाणी ने राजनाथ सिंह को भेजे पत्र में आरोप लगाया कि पार्टी के कुछ नेता अपना निजी एजेंडा चला रहे हैं। लेकिन अगर सच पूछें, तो इस आरोप के घेरे में सबसे ज्यादा वही आते हैं। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए वह पार्टी हित और राजनीतिक यथार्थ की अनदेखी कर दबाव की राजनीति कर रहे हैं।
वर्ष 1999 में जब राजग की दूसरी सरकार बनी थी, उस समय भी उन्होंने दबाव की राजनीति की थी। यह अलग बात है कि वाजपेयी के करिश्माई व्यक्तित्व के आगे उनकी नहीं चल पाई। उस समय इनके समर्थकों ने दबाव बनाया था कि अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रपति बन जाएं और आडवाणी प्रधानमंत्री।
लेकिन वाजपेयी इस पर सहमत नहीं हुए। दबाव की वजह से ही उन्हें तब उप-प्रधानमंत्री बनाया गया था। पर उप-प्रधानमंत्री को जो अधिकार मिलने चाहिए थे और उनके पास जो फाइलें जानी चाहिए थीं, वह उन्हें नहीं भेजी जाती थीं। संघ में यह धारणा थी कि लौहपुरुष आडवाणी एक सफल गृह मंत्री साबित होंगे, लेकिन कई ऐसे उदाहरण हैं कि वह इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे।
वास्तविकता यह है कि आडवाणी पार्टी के संगठन को चलाने वालों से कट गए हैं और कुछेक चाटुकारों से घिरे हुए हैं। वह आज के राजनीतिक यथार्थ को समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि विभिन्न प्रदेशों के जो कार्यकर्ता और नेता दिल्ली आते हैं, उनके साथ इनका कोई संपर्क नहीं है। नतीजतन जनाधार नहीं होने के कारण इन्हें जमीनी हालात की पूरी सच्चाई पता नहीं होती है।
जहां तक हालिया इस्तीफे की बात है, तो मुझे लगता है कि उन्हें इस्तीफे तक पहुंचाने और इस्तीफा वापस लेने के पीछे सुषमा स्वराज की भूमिका प्रबल थी। उमा भारती का एक बयान, जो कुछ अखबारों में भी छपा है कि मुझे विश्वास है कि सुषमा स्वराज आडवाणी जी को मना लेंगी, मुझे ऐसा सोचने का आधार देता है।
यह सवाल उठ सकता है कि अगर इस्तीफा दिलवाने में सुषमा स्वराज की भूमिका थी, तो फिर इस्तीफा वापस लेने के लिए उन्होंने जोर क्यों डाला। यह तो निश्चित हो गया था कि नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाने के अपने फैसले से भारतीय जनता पार्टी पीछे हटने वाली नहीं थी।
ऐसे में अगर आडवाणी को नहीं मनाया जाता और वह अपना इस्तीफा वापस नहीं लेते, तो फिर पार्टी अपने काम में व्यस्त हो जाती और लोग धीरे-धीरे आडवाणी को भूलने लगते। लेकिन मामला ठंडा होने के बाद जब इसकी छानबीन होती, तो शायद सुषमा स्वराज का लोकसभा में नेता विपक्ष के पद पर बने रहना, मुश्किल ही नहीं, असंभव होता। इसलिए उन्होंने आडवाणी को मनाने पर जोर डाला और उनसे इस्तीफा वापस मंगवाया।
इस्तीफा प्रकरण से आडवाणी ने जहां पार्टी में अपना कद घटाया है, वहीं भाजपा में जिन कुछ लोगों का नाम प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में लिया जा रहा था, उनमें से दो-एक तो खुद का और दूसरा, सुषमा स्वराज-का नाम कटवा दिया है। पार्टी नेता अब बुजुर्ग नेता के तौर पर आडवाणी का सार्वजनिक रूप से सम्मान तो करेंगे, लेकिन पार्टी के फैसलों में उनकी राय के कोई मायने नहीं होंगे।