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सुरंग संकेत देती है

सुरेश भाई Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 22 Nov 2023 09:11 AM IST

सार

इस सुरंग में पहले भी भूस्खलन की सूचनाएं आती रही हैं। यदि यहां ह्यूम पाइप भी लगे होते, तो फंसे हुए मजदूरों को तत्काल बाहर निकाला जा सकता था। 
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उत्तरकाशी में टनल हादसा - फोटो : अमर उजाला


दुखद है कि मजदूरों को दिवाली वाले दिन भी इतने जोखिम भरे काम पर लगाया गया। सुरंग के मुहाने से 230 मीटर आगे 60 मीटर की लंबाई में मलबा भरने के कारण अंदर फंसे मजदूर किस स्थिति में जी रहे होंगे, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। यह घटना सवाल पैदा करती है कि विकास कार्यों व हिमालय की संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे स्थापित हो। वैज्ञानिक युग

की मशीनों की ताकत पहाड़ की संवेदनशीलता के सामने बौनी पड़ रही है, क्योंकि ड्रिलिंग कार्य में बड़े पत्थर बाधा बन रहे हैं। वहीं अंदर मलबे में दबी मशीनें भी अवरोध बन रही हैं। निर्माण कार्यों में मजदूरों के अधिकार और उनकी जीवन रक्षा सबसे महत्वपूर्ण है और इसके लिए उपाय किए जाने चाहिए। 


एक समस्या यह है कि जोखिमपूर्ण स्थितियों में मीडिया और अन्य के दबाव में प्रभावितों की सूची तो बाहर आती है, लेकिन मजदूरों को काम पर लगाने से पहले उनके बारे में जो जानकारी, जैसे श्रम विभाग में पंजीकरण आदि, निर्माणकर्ताओं के पास होनी चाहिए थी, वह उपलब्ध नहीं हो पाती है। यदि सुरंग का निर्माण विस्फोटों से होता है, तो वह मजदूरों के लिए इसी तरह जानलेवा साबित हो सकती है। विस्फोटों का इतना दुष्प्रभाव है कि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन (126 किलोमीटर) के लिए खोदी जा रही सुरंग के ऊपर लगभग 30 गांव के घरों में दरारें आ चुकी हैं। जल स्रोतों पर प्रभाव पड़ रहा और जमीन की नमी भी सूख रही है।


इस सुरंग में पहले भी भूस्खलन की सूचनाएं आती रही हैं। यदि यहां ह्यूम पाइप भी लगे होते, तो फंसे हुए मजदूरों को तत्काल बाहर निकाला जा सकता था। सिल्क्यारा सुरंग में मजदूरों के फंसने की घटना कोई नई नहीं है। इससे पहले भी 2021 में बद्रीनाथ के पास ऋषि गंगा में आई भीषण बाढ़ के कारण तपोवन सुरंग के अंदर जमा हुए भारी मलबे में 206 मजदूरों की जान चली गई थी। 1991 के उत्तरकाशी भूकंप में मनेरी भाली सुरंग के ऊपर बसे हुए जामक गांव में दर्जनों लोग मारे गए थे। वर्ष 2005 में जोशियाडा-धरासू सुरंग में भी 20 श्रमिक करीब 14 घंटे तक फंसे रहे। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के समय भी सुरंग परियोजनाओं के मलबे के कारण ही भीषण तबाही हुई थी। इस वर्ष जोशीमठ में हुए भू-धंसाव का कारण भी स्थानीय लोग इसके नीचे सुरंग निर्माण को ही मानते हैं।


उत्तराखंड में सुरंग आधारित परियोजनाओं को जमीन पर उतारने के तेज प्रयास हो रहे हैं। पिछले दिनों देहरादून में दुनिया भर के सुरंग विशेषज्ञों ने इस विषय पर चर्चा की है। अब रानीपोखरी से टिहरी झील तक 32 किलोमीटर सुरंग निर्माण की तैयारी चल रही है। मसूरी के नाग मंदिर रोड से छतरी बैंड कैंप्टी रोड तक सुरंग के लिए सर्वे हुआ था। लेकिन सुरक्षा कारणों से ही इसे रोकने की बात कही जा रही है। घुत्तू से गुप्त काशी तक 11 किलोमीटर की सुरंग है। प्रस्तावित 120 किलोमीटर लंबी गंगोत्री रेल लाइन का ज्यादातर हिस्सा सुरंग के अंदर होगा और इसके ऊपर भी सैकड़ों गांव होंगे। 


उत्तराखंड में प्रस्तावित 558 बांधों के लिए सैकड़ों किलोमीटर लंबी सुरंग के ऊपर हजारों गांव होंगे, तो उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता में होनी चाहिए। आजकल सोशल मीडिया पर भी वैज्ञानिक और पर्यावरणविद लिख रहे हैं कि इन प्रस्तावित और निर्माणाधीन सुरंगों में भी जिंदगी अटक सकती है। उत्तरकाशी में पिछले तीन दशक में 70 से अधिक बार भूकंप आ चुका है और धरती में दरारें चौड़ी हो रही हैं। सुरंगों से धरती खोखली हो जाती है, जिसके चलते तेज भूकंप के दौरान भारी तबाही हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि बड़ी परियोजनाओं में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पहले से ही कोई ठोस योजना तैयार की जाए।
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