अमेरिका के 25वें राष्ट्रपति विलियम मैकेनले व्हाइट हाउस पहुंच गए हैं। वह हैरिसन की हार का बदला लेने वाले हैं। अमेरिकी उद्योग जगत मुतमइन है कि सीमा शुल्क के मामले में कुछ बड़ा होने वाला है। मैकनले ने रेसीप्रोकल (जैसे को तैसा) टैरिफ की बुनियाद रखी है।
जिगर मुरादाबादी से माजरत के साथ- एक लफ्ज-ए टैरिफ का इतना-सा फसाना है/ सिमटे तो सियासत है, फैले तो जमाना है।
दुनिया हैरां है। बौराए ट्रंप टैरिफ का चाबुक लिए जिस किसी को पीट रहे हैं। कनाडा, मेक्सिको, यूरोप और चीन तो पलट कर चढ़ लिए, भारत उन्हें मना रहा है। ट्रंप के पास दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और अब उस बाजार में माल बेचने के बदले वह वसूली कर रहे हैं। एक पूरी पीढ़ी ने ऐसा दौर न देखा होगा, जब पूरे ब्रह्मांड को आर्थिक उदारीकरण का ज्ञान देने वाला अमेरिका संरक्षणवादी बनकर दुनिया में ट्रेड जंग की यलगार कर रहा है। ट्रंप को अपने देश में महंगाई, बेरोजगारी और मंदी आने की तनिक भी चिंता नहीं है।
अगर आपको लगता है कि ट्रंप कुछ अनोखा कर रहे हैं, तो टाइम मशीन में बैठिए, क्योंकि हम आपको अमेरिकी इतिहास की पिछली सदियों का त्वरित सफर कराने वाले हैं, जहां आपको पता चलेगा कि यह टैरिफबाजी ट्रंप की घातक ईजाद नहीं है। यह तो अमेरिकी राजनीति की घुट्टी में मिला है। ट्रंप रिपब्लिकन हैं और उनके राजनीतिक पुरखों की सियायत का ईंट-गारा इसी संरक्षणवाद से बना था। इसलिए तो लोगों को ट्रंप में अमेरिकी इतिहास के टैरिफ सूरमा 25वें राष्ट्रपति विलियम मैकेनले दिखते हैं। ट्रंप अपने इस पुरखे के बड़े मुरीद भी हैं। ट्रंप के टैरिफ उस्ताद यानी मरहूम विलियम मैकेनले से मिलने से पहले टाइम मशीन 19वीं सदी के अंत में आ गई है। यह 6 जुलाई, 1854 है। जैक्सन, मिशीगन में ओक के पेड़ों के झुरमुट में अमेरिकी सियासत को सदियों तक प्रभावित करने वाली रिपब्लिकन पार्टी की नींव रखी जा रही है। 10,000 लोगों के इस समूह को दो अभियानों ने जोड़ा है। एक है, गुलामी से मुक्ति और दूसरा, देशी उद्योगों को संरक्षण।
अमेरिकी आकाश में विचरते हुए आप नए औद्योगीकरण की चहल-पहल महसूस कर सकते हैं। अलबत्ता राजनीतिक गलियारों में टहलते हुए आपको पता चलेगा कि ब्रिटेन की कंपनियां तेजी से अमेरिका में आ रही हैं। देश के उद्योगपति घरेलू उद्योगों के संरक्षण और मुक्त व्यापार के बीच बंटे हैं। अखबारों में ब्रिटेन और अमेरिका के तनावपूर्ण आर्थिक अतीत का जिक्र है, जब नेपोलियन वाले युद्धों के दौरान ब्रिटेन में अमेरिका पर व्यापार प्रतिबंध लगाए थे। ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने अपनी शुरुआत से ऊंचे टैरिफ यानी देसी बाजार को विदेशियों के लिए सीमित रखने की नीति को अपनी बुनियादी आर्थिक सोच का आधार बना लिया।
अब हम वाशिंगटन में हैं। वक्त है 1861 का। आपके सामने जो शख्सियत दिख रही है, वह अब्राहम लिंकन हैं। जरा कांग्रेस की बैठक के भीतर चलिए। वहां मॉरिल टैरिफ ऐक्ट पास हो रहा है। इसका नामकरण कांगेस सदस्य जस्टिन मॉरिल के नाम पर हुआ। राष्ट्रपति लिंकन ऊंचे सीमा शुल्क यानी टैरिफ के बड़े पैरोकार हैं। वह नहीं चाहते हैं कि विदेशी सामान या पूंजी अमेरिका में आए। इस कानून के बाद पहली बार अमेरिका में सीमा शुल्कों का पूरा ढांचा बदल गया है। बीते दशकों में डेमोक्रेट्स ने शुल्क दरें कम रखी थीं, मगर रिपब्लिकन ऊंचे टैरिफ का राज ले आए हैं। अमेरिकी आर्थिक नीतियों की धुरी बदल गई है।
अब टाइम मशीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ आचार्य विलियम मैकेनले की दौर की तरफ बढ़ रही है। अमेरिका में घरेलू उद्योग तेजी से बढ़ रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी का आधार बढ़ रहा है। अमेरिकी सियासत पर उद्योग का दबदबा उफान पर है। 1889 के चुनाव से अमेरिका में ऊंचे सीमा शुल्क की राजनीति गरमा गई थी। राष्ट्रपति बेंजामिन हैरिसन ने सीमा शुल्क ऊंचे रखकर आयात महंगा करने की बुनियाद रख दी थी। डेमाक्रेट प्रत्याशी ग्रोवर क्लीवलैंड बाजार खोलने यानी सीमा शुल्क घटाने के हिमायती थे और वह जीत गए। यह 1897 है और अमेरिका के 25वें राष्ट्रपति विलियम मैकेनले व्हाइट हाउस पहुंच गए हैं। वह हैरिसन की हार का बदला लेने वाले हैं। अमेरिकी उद्योग जगत मुतमइन है कि सीमा शुल्क के मामले में कुछ बड़ा होने वाला है। मैकेनले ने अमेरिका में टैरिफ रिकॉर्ड 48 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। उनके कानून में सभी उत्पाद और सेवाएं शामिल हैं।
मैकेनले ने रेसीप्रोकल (जैसे को तैसा) टैरिफ की बुनियाद रखी है, यानी जो देश जितनी ड्यूटी लगाएगा, अमेरिका भी उसके उत्पादों पर उतना सीमा शुल्क लगाएगा। अब आपको पता चल गया होगा कि डोनाल्ड ट्रंप भारत पर जो रेसीप्रोकल टैरिफ थोपने जा रहे हैं, वह विलियम मैकेनले की रुल बुक से निकले हैं। ट्रंप भी अपने गुरु मैकेनले की तरह मानते हैं कि आयात महंगा करने से अमेरिका में अमीरी आएगी और रोजगार बढेंगे। वह कहते हैं कि ऊंचे सीमा शुल्क के दौर में अमेरिका सबसे समृद्ध था। ट्रंप का इशारा 19वीं सदी के अंत से 20 वीं सदी के मध्य युग की तरफ है। मैकेनले के फैसले विवादित हो रहे हैं। अमेरिका में महंगाई बढ़ गई है, उपभोक्ता परेशान हैं, और उद्योगों की पौ-बारह है। भष्टाचार की खबरें सुर्खियों में हैं।
मार्क ट्वेन के उपन्यास के बारे में सुना आपने? उन्होंने उस दौर को गिल्डेड एज कहा है और इसी नाम से उपन्यास लिखा है। यह सोना मढ़ी समृद्धि है, जिसके भीतर महंगाई और गरीबी भरी है। अब हम अमेरिका के जिस दौर में पहुंच रहे हैं, वह बड़ा कुख्यात है। यह 1929 का साल है। व्हाइट हाउस की कुर्सी पर रिपब्लिकन राष्ट्रपति हरबर्ट हूवर हैं। हूवर की पार्टी के दो सदस्यों स्मूट और हाउले द्वारा पेश नए कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। इसके बाद अमेरिका में औसत सीमा शुल्क दर यानी टैरिफ 48 हो गए हैं। यह पहला मौका है, जब अमेरिका के 1028 अर्थशास्त्रियों ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर बताया है कि यह संरक्षणवाद अमेरिका को बर्बाद कर रहा है, देश में मंदी आ रही है, मगर हूवर ने किसी की नहीं सुनी। स्टॉक मार्केट के चीथड़े उड़ रहे हैं। दो साल के भीतर व्यापार करीब 60 फीसदी टूट गया। अमेरिका महामंदी में धंस गया है। इधर जर्मनी और जापान का उग्र राष्ट्रवाद दुनिया की सूरत बदलने जा रहा है।
टाइम मशीन अब 2025 के वाशिंगटन की तरफ निकल चुकी है। आपकी सीट पर रखे दस्तावेजों को पढ़ने से पता चलेगा कि सिविल वार से पहले विश्वयुद्ध तक अमेरिका में अधिकांश मौकों पर रिपब्लिकन सत्ता में थे। इसलिए सीमा शुल्क की दरें 50 फीसदी तक हो गई थीं। डगलस ए इर्विन की मशहूर किताब क्लैशिंग ओवर कॉमर्स, ए हिस्ट्री ऑफ यूएस ट्रेड पॉलिसी बताती है कि अमेरिका के इतिहास के पहले 70 वर्षों में राजनीति सीमा शुल्क बढ़ाने की हिमायती नहीं थी। राजस्व संभालने के लिए इनका इस्तेमाल होता था, मगर सिविल वार के बाद जब अमेरिका में राजनीतिक ताकत दक्षिण से निकल कर उत्तर में आ गई, तो देसी उद्योगों का संरक्षण सियासत चमकाने का फार्मूला हो गया।
हम वाशिंगटन में उतर रहे हैं। ट्रंप सीमा शुल्क का चाबुक फटकारते हुए अपने टैरिफ उस्ताद मैकेनले को याद कर रहे हैं और शेयर बाजार सीमा शुल्क बढ़ने के बाद अमेरिका में मंदी की आहट सुनाई दे रही है। हम फिर मिलते हैं, अगले सफर पर...