दादाजी के कंधे पर झुर्रियां
दादाजी के कंधे पर हैं ढेर सारी झुर्रियां
जिन पर नजर आते हैं
ढलान वाले पहाड़ और घाटियां
अपने हाथी पर राजा भी
मेरी तरह ही सवार हंै दादाजी के कंधे पर
अपनी शर्ट की जेब में कुछ रहस्य छुपाए
राजा भी सवारी करता हाथी की पीठ पर
कभी मेरे परदादा भी करते थे
अपने दादा के कंधे पर सवारी
बहुत कुछ मेरी तरह ही
दादा जी की सवारी
हाथी वापस चला
2.
हर रोज नजर आता है वही जंगल
जो है मेरा पसंदीदा रास्ता
इस रास्ते के लिए जंगल का शुक्रिया
क्योंकि...यह बन जाती है सत्य की राह
जैसे कोई बिछी हुई बेतरतीब सेज
कि जैसे इधर-उधर बिखरे से मुरझाए हुए पौधे
कोई चिकना सा लाल सुर्ख रास्ता
या फिर जैसे कोई सांप की केंचुली
कि जैसे किसी बाघ के पैरों के निशान
जैसे यहां से गुजरते हैं पक्षियों के गीत
हर बार उस तरफ खुद-ब-खुद मुड़ जाते हैं कदम
जिस ओर रोशनी और छांव मिलती है जहां
जो मिलती हैं सिर्फ पहाड़ों
और अपने बड़ों के साथ में
कदमों को कहना नहीं पड़ता है...
एकांत में भी हर जगह घूम आते हैं
मगर कदमों को घर सबसे है प्यारा
मगर, कशमकश में हैं
इससे भी अच्छी जगह की तलाश में
जंगलों की झुरमुटों में खोजते हैं
कोई आसान सा रास्ता
जिनमें छुपे हैं रहस्य और एक डर
ये रास्ते जो सदियों से वहीं डटे हुए....।
* यह कविता The Wrinkles on Grandpa's Shoulder शीर्षक कविता का अनूदित अंश है।
कन्नड़ साहित्यकार यू.आर. अनंतमूर्ति की रचनाओं के अनुवाद दुनिया भर की अनेक भाषाओं में हुए हैं। उनकी रचनाओं पर कई फिल्में भी बनीं। ज्ञानपीठ पुरस्कार और पद्म भूषण जैसे महत्वपूर्ण पुरस्कार से सम्मानित अनंतमूर्ति 'नेशनल बुक ट्रस्ट', नई दिल्ली के चेयरमैन और साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष भी रहे। `संस्कार’, `अवस्था’, `भारतीपुर’, `भव’ और `दिव्या’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं।