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मुद्दा: जल प्रबंधन सुझाव नहीं, अनिवार्यता है… जीवाश्म ईंधन की जगह अक्षय ऊर्जा अपनाना जरूरी

सीमा जावेद
Updated Tue, 22 Oct 2024 06:31 AM IST

सार

नेपाल में हुई भारी बारिश और बाढ़, यही बताती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की रोकथाम से युक्त शहर आज की जरूरत बन चुके हैं।
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नेपाल में आई बाढ़ से मची तबाही - फोटो : अमर उजाला


जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की रोकथाम से युक्त शहर आज की दुनिया की जरूरत बन चुके हैं। ग्लोबल वार्मिंग के चलते वर्ष 2024 ने झुलसा देने वाली गर्मी के मामले में बाजी मार ली। वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन  (डब्ल्यूडब्ल्यूए) रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अप्रैल का महीना पूरी दुनिया के लिए सबसे गर्म रहा और लगभग सारे एशिया में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। ग्लोबल वार्मिंग अब 1.5 डिग्री सेल्सियस की लक्ष्मण रेखा को पार करती दिख रही है। नेपाल, भारत, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने डब्ल्यूडब्ल्यूए के तत्वावधान में मिलकर आकलन किया कि जलवायु परिवर्तन ने किस हद तक अत्यधिक वर्षा की संभावना और तीव्रता को बदल दिया है। जलवायु परिवर्तन के चलते अचानक एक साथ तीन दिनों तक लगातार बेतहाशा पानी बरसना व बाढ़ साधारण घटना बनती जा रही है। नेपाल के जल विज्ञान व मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, घटना के दौरान कई केंद्रों में दर्ज की गई वर्षा 54 वर्षों में सबसे अधिक थी।


डब्ल्यूडब्ल्यूए के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से तीन दिनों तक भारी बारिश की घटनाएं करीब 18 फीसदी अधिक तीव्र हो गई हैं और उनकी संभावना दोगुनी तक ज्यादा हो गई हैं। कुल मिलाकर उपलब्ध जलवायु मॉडल 1.3 डिग्री सेल्सियस ठंडी जलवायु की तुलना में तीव्रता में 10 फीसदी वृद्धि का संकेत देते हैं। भविष्य के वार्मिंग परिदृश्य के तहत जहां वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में दो डिग्री सेल्सियस अधिक है। वहीं, जलवायु मॉडल नेपाल में तीन दिनों तक हुई भारी वर्षा की घटनाओं की भविष्यवाणी करते हैं। गर्म वातावरण अधिक नमी को बनाए रख सकता है, जिससे भारी बारिश होती है। काठमांडो गंडकी, बागमती, मधेश और कोशी प्रांत में विनाशकारी भूस्खलन और बाढ़ भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित थे। काठमांडो और ललितपुर के महानगरीय क्षेत्र, प्राकृतिक जल निकासी बिंदुओं की कमी के साथ घाटी के किनारे अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बाढ़ के प्रति बेहद संवेदनशील हैं, जो बागमती, सप्तकोशी, नारायणी, सरदु, रेव और नक्खू नदियों और उनकी सहायक नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन से सीधे प्रभावित हुए।


महत्वपूर्ण बात यह है कि काठमांडो घाटी में तेजी से हो रहे अनियोजित शहरीकरण (1990-2020 के बीच निर्मित क्षेत्रों में 386 फीसदी की वृद्धि) और वनों की कटाई (1989-2019 से वन क्षेत्र में 28 फीसदी की कमी) ने प्राकृतिक जल प्रक्रियाओं को बाधित किया है। अनियोजित विकास ने नए बढ़ रहे शहरों को जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति टिकाऊ बनाने की जगह बाढ़ क्षेत्रों और नदियों के पास निर्माण ने लोगों और संपत्तियों को बाढ़ के सीधे संपर्क में ला दिया। इसलिए ऐसे शहरों का निर्माण करें, जो जलवायु परिवर्तन की वजह से बाढ़ से निपटने के लिए अपने ड्रेनेज तंत्र को बेहतर बनाएं, गर्मी से बचने के लिए कूलिंग छतें बनाएं, ऊर्जा के लिए नवीकरणीय ऊर्जा से युक्त हों, जल प्रबंधन को अपनाना अब एक कोशिश नहीं, बल्कि कार्यवाही होनी चाहिए।


कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के इमैनुएल राजू के अनुसार, ‘आपदाएं अनियोजित विकास कार्यों के नतीजे में उत्पन्न होने वाली समस्याएं हैं। जैसा कि हमने नेपाल में देखा है। असुरक्षित क्षेत्रों में निर्माण से बचने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।’ काठमांडो घाटी नेपाल में बाढ़ जोखिम प्रबंधन प्रयासों का केंद्र भी नहीं है। हालांकि तराई क्षेत्रों को आम तौर पर उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की श्रेणी में रखा जाता है और ऐतिहासिक रूप से इन इलाकों में बेहद विनाशकारी बाढ़ देखी गई है। ऐसे में इसके लिए किफायती पूर्वानुमान कार्रवाई प्रणालियों को लगाए जाने की जरूरत है। साथ ही अत्यधिक बारिश के पानी की निकासी के तरीके अपनाए जाने की जरूरत है।


वनों का कटाव और तीव्र शहरीकरण होने से, खासतौर पर नदी के किनारे बाढ़ क्षेत्र के मैदानों में, बाढ़ के रास्ते में आबादी में बढ़ोतरी हुई है। व्यापक स्थानिक योजना, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और अनुकूलन, प्रभावी नीति प्रवर्तन और बढ़ी हुई सार्वजनिक जागरूकता काठमांडो घाटी सहित मध्य और पूर्वी नेपाल में बाढ़ के जोखिमों को कम करने के लिहाज से बेहद जरूरी हैं। इंपीरियल कॉलेज लंदन के पर्यावरण नीति केंद्र में वरिष्ठ व्याख्याता फ्रेडरिक ओटो के अनुसार, ‘वर्ष 2024 में एशिया में बाढ़ से होने वाली मौतों की संख्या तीन गुनी हो गई। जब तक जीवाश्म ईंधन की जगह अक्षय ऊर्जा को नहीं अपनाया जाएगा, तब तक इस तरह की बाढ़ विकराल, घातक और ज्यादा नुकसानदायक होती रहेंगी।’

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