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ब्रह्मांड, शून्य और समय: एलियंस का अस्तित्व, कई प्रश्न और अरस्तू के विचार

रॉबर्ट विलियम स्मिथ, इतिहास के प्रोफेसर, अल्बर्टा विश्वविद्यालय Published by: Pavan Updated Sun, 31 May 2026 08:10 AM IST

सार

क्या इस ब्रह्मांड में हमारे अलावा भी कोई है? क्या एलियंस का अस्तित्व है? इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हमें अरस्तू के विचारों को खंगालना होगा, जो अपनी किताब ऑन द हेवेंस  में कहते हैं कि पृथ्वी ही केंद्र है और उसके चारों ओर फैला ब्रह्मांड का वह रहस्य, जिसकी खोजबीन कॉपरनिकस की दूरबीन से लेकर आज जेम्स वेब टेलीस्कोप भी पूरी तरह नहीं कर सका है। अक्सर विज्ञान-कथा लेखक आर्थर सी क्लार्क के एक उद्धरण का उल्लेख किया जाता है, जो यह बखूबी कहता है: ‘कभी-कभी मुझे लगता है कि इस ब्रह्मांड में हम अकेले हैं, और कभी-कभी लगता है कि हम अकेले नहीं हैं। दोनों ही स्थितियों में, यह विचार बेहद चौंकाने वाला है।’
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ब्रह्मांड, शून्य और समय - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


न कोई शून्य, न कोई समय

ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में अरस्तू के विचारों का प्राचीन यूनानी जगत पर वर्चस्व था। उन्होंने यह तर्क दिया कि केवल एक ही दुनिया है, जिसके केंद्र में एक स्थिर पृथ्वी स्थित है। ग्रह पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं। उनके परे तारों का मंडल, अथवा स्वर्ग है। उन्होंने अपनी पुस्तक ऑन द हेवेंस  में लिखा, ‘यह स्पष्ट है कि स्वर्ग के बाहर न तो कोई स्थान है, न ही कोई शून्य, और न ही कोई समय। अतः वहां जो कुछ भी है, उसकी प्रकृति ऐसी है कि वह न तो कोई स्थान घेरता है, और न ही समय उसे जीर्ण करता है।’


अरस्तू की शिक्षाओं ने बाद में कैथोलिक चर्च में हलचल मचा दी, क्योंकि कई धर्मशास्त्रियों को चिंता होने लगी थी कि अरस्तू के विचार बहुत ज्यादा हावी होते जा रहे हैं। पेरिस के बिशप, एटियेन टेम्पियर ने इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए ‘1277 की निंदा’ जारी की। इसके तहत लगभग 219 प्रस्तावों, जिनमें से कई अरस्तू की शिक्षाओं से ही लिए गए थे, को पढ़ाना प्रतिबंधित कर दिया गया।


प्रस्ताव 34 में, एटियेन टेम्पियर ने उन लोगों को निशाना बनाया, जिन्होंने अरस्तू का अनुसरण करते हुए दावा किया था कि ईश्वर अन्य संसारों की रचना नहीं कर सकते थे। उन्होंने तर्क दिया कि इस मत को अपनाना ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को नकारने जैसा था। एक धर्मशास्त्री, जिन्होंने सर्वशक्तिमत्ता से जुड़े तर्क को और आगे बढ़ाया, वह निकोलस ऑफ कुसा थे। अपनी पुस्तक ऑफ लर्नड इग्नोरेंस में उन्होंने बसे हुए संसारों की बहुलता का जिक्र किया है।


दूरबीन का आविष्कार

एक सदी बाद, निकोलस कोपरनिकस ने अपनी किताब ऑन द रिवोल्यूशंस ऑफ द हेवनली स्फेयर्स  में पृथ्वी को आसमान में जगह दी। वह पहले ऐसे विचारक थे, जिन्होंने सुझाव दिया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। और अगर पृथ्वी नामक ग्रह पर जीवन मौजूद है, तो क्या यह तर्क देना उचित नहीं था कि दूसरे ग्रहों पर भी जीवन हो सकता है?


17वीं सदी की शुरुआत में दूरबीन के आविष्कार ने इस विचार को और भी ज्यादा बढ़ावा दिया। उदाहरण के लिए, दूरबीन से यह पता चला कि चांद पूरी तरह से गोल नहीं है, जैसा कि अरस्तू के अनुयायी मानते थे, बल्कि उस पर गड्ढे और पहाड़ हैं, और वह काफी हद तक पृथ्वी जैसा ही है। सदी के अंत तक, बर्नार्ड ले बोवियर डी फॉन्टेनेल ने पहली वैज्ञानिक ब्लॉकबस्टर (कन्वर्सेशन्स ऑन द प्लुरैलिटी ऑफ वर्ल्ड्स) लिखी थी। फॉन्टेनेल ने हमारे सौरमंडल के सभी ग्रहों और अन्य तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों पर भी जीवित प्राणियों के होने की संभावना पर विचार किया था। हालांकि, इन दावों के पक्ष में अनुभवजन्य प्रमाण बहुत कम थे और यह स्थिति दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तक बनी रही।


मंगल ग्रह की दौड़

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, सरकारों ने विज्ञान में भारी मात्रा में पैसा निवेश करना शुरू कर दिया, जिसे राष्ट्रीय कल्याण के लिए महत्वपूर्ण माना जाने लगा था। नतीजतन, खगोल विज्ञान तथा ग्रहीय विज्ञान, दोनों ही क्षेत्रों में जबर्दस्त तेजी आई। सोवियत संघ के साथ अंतरिक्ष दौड़ और प्रतिष्ठा की लड़ाई ने भी अमेरिका में अंतरिक्ष यानों को पूरे सौरमंडल में आगे बढ़ाया। 20वीं सदी की शुरुआत में, कुछ लंबी और सीधी लकीरों को लेकर विवाद खड़ा हो गया था, जिन्हें लोग मंगल ग्रह की सतह पर देखने का दावा कर रहे थे। कुछ लोगों का मानना था कि मंगल ग्रह के निवासियों ने ग्रह के ध्रुवों से सूखे रेगिस्तानी इलाकों तक पानी लाने के लिए नहरें बनाई थीं।
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1964 में, अमेरिका ने मंगल ग्रह के एक मिशन पर ‘मैरिनर 4’ को लॉन्च किया। यह अंतरिक्ष यान जुलाई, 1965 में मंगल ग्रह के पास से गुजरा, और अंतरिक्ष से किसी दूसरे ग्रह की पहली तस्वीरें लीं। नहरों के सबूत मिलने के बजाय, इन 21 तस्वीरों से पता चला कि इस ग्रह की सतह चंद्रमा जैसी है और उस पर गड्ढे बने हुए हैं। 1976 तक, दो अमेरिकी अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह की परिक्रमा कर रहे थे, जबकि ग्रह की सतह पर, दो अन्य अंतरिक्ष यानों ने प्रयोग किए, जिनमें जीवन के संकेतों की खोज के लिए मंगल की मिट्टी को इकट्ठा करके उसका विश्लेषण करना भी शामिल था।


जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप

अब हम और भी शक्तिशाली वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से पृथ्वी से बाहर जीवन के सवाल का सामना कर रहे हैं। 1995 में, खगोलविदों मिशेल मेयर और डिडिएर क्वेलोज ने ऐसे पहले ग्रह की खोज की, जो सूर्य जैसे किसी तारे की परिक्रमा कर रहा था। इसका नाम ‘51 पेगासी बी’ या ‘डिमिडियम’ रखा गया। अब तक, नासा ने 6,000 से ज्यादा एक्सोप्लैनेट (सौरमंडल के बाहर मौजूद ग्रह) की पुष्टि की है, और माना जाता है कि ऐसे अरबों ग्रह मौजूद हैं।


चंद्रमा से परे और पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर स्थित जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप एक्सोप्लैनेट्स के वायुमंडलों की जांच कर रहा है। पृथ्वी का वायुमंडल खगोलीय पिंडों से आने वाली ज्यादातर इंफ्रारेड रोशनी को पृथ्वी पर मौजूद दूरबीन तक पहुंचने से रोक देता है। पर, जेम्स वेब दूरबीन का विशाल दर्पण इंफ्रारेड रोशनी को इकट्ठा कर पाता है, जिसका विश्लेषण फिर अंतरिक्ष यान के उपकरण करते हैं। इससे खगोलविदों को हमारे सौरमंडल के बाहर मौजूद ग्रहों के वायुमंडल की बनावट के बारे में जानने का मौका मिलता है।


इस टेलीस्कोप में ऐसे उपकरण भी लगाए गए हैं, जो उस तारे की रोशनी को रोक देते हैं, जिसके चारों ओर कोई एक्सोप्लैनेट चक्कर लगा रहा होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि उस एक्सोप्लैनेट की खुद की तस्वीर ली जा सके। अभी तक किसी भी एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल में जीवन होने का कोई भी पुख्ता सबूत नहीं मिला है। हालांकि, 2025 में, नेचर  में प्रकाशित एक शोध पत्र में दावा किया गया कि नासा के पर्सिवियरेंस मार्स रोवर द्वारा मंगल ग्रह पर जेजेरो क्रेटर में एक प्राचीन शुष्क नदी तल से लिए गए चट्टान के नमूने में प्राचीन सूक्ष्मजीव जीवन के ‘संभावित जैव-हस्ताक्षर’ हो सकते हैं।


तो, अभी चल रही परग्रही जीवन (एलियंस) की इस खोज के बारे में हम क्या सोचें? अक्सर विज्ञान-कथा लेखक आर्थर सी क्लार्क के एक उद्धरण का उल्लेख किया जाता है, जो यह बखूबी कहता है: ‘कभी-कभी मुझे लगता है कि इस ब्रह्मांड में हम अकेले हैं, और कभी-कभी लगता है कि हम अकेले नहीं हैं। दोनों ही स्थितियों में, यह विचार बेहद चौंकाने वाला है।’ -द कन्वर्सेशन
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