द हिमालयन फेस-ऑफ
लेखक: शिशिर गुप्ता
प्रकाशक: हैशे इंडिया
अब मोदी प्रधानमंत्री बन चुके हैं और उनके पास भारत-चीन संबंधों को नई दिशा देने का मौका है। मगर उन्हें याद रखना होगा कि इतिहास में सब कुछ रफ ड्रॉफ्ट की तरह नहीं होता।
ऐसे समय जब चीन में पंचशील सिद्धांत की साठवीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, भारत में नरेंद्र मोदी की अगुआई में ऐसी सरकार ने सत्ता संभाली है, जो कि जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति से ही इत्तेफाक नहीं रखती। यह महज संयोग नहीं है कि 27 मई को जिस दिन मोदी सरकार ने काम संभाला, उसी दिन नेहरू की पचासवीं पुण्यतिथि थी। यही नहीं, इससे एक दिन पहले शपथ ग्रहण में दक्षेस देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित कर मोदी ने खुद को इस क्षेत्र के नए नेता के रूप में भी पेश किया। मगर, विदेश नीति के मोर्चे पर उनकी असली परीक्षा दरअसल दक्षेस देशों के साथ रिश्तों को लेकर नहीं, बल्कि चीन के साथ संबंधों को लेकर होनी है।
वास्तव में ढाई हजार वर्ष पुरानी विरासत के बावजूद हिमालय के दोनों ओर के इन पड़ोसियों के रिश्ते बेहद जटिल रहे हैं। औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के बाद दोनों देशों ने एक लंबा मुकाम तय किया है, लेकिन रिश्तों में खास तब्दीली नहीं आई है। पत्रकार शिशिर गुप्ता की किताब `द हिमालयन फेस-ऑफ’ दोनों देशों के रिश्तों की परतों को खोलती है और हमें इतिहास के उन मोड़ों पर ले जाती है, जहां से हम भविष्य की थाह ले सकते हैं। लेकिन काफी शोध और संदर्भों के साथ लिखी गई यह किताब दोनों देशों के सीमा संबंधी विवाद के साथ ही ब्रिक्स जैसे मंचों पर उनकी साझेदारी और द्विपक्षीय व्यापार की संभावनाएं भी तलाशती है।
भारत और चीन संबंधों को समझने के लिए 10 मार्च, 1959 का घटनाक्रम सबसे अहम कहा जा सकता है, जब ल्हासा में तिब्बतियों ने विद्रोह किया था और वहां से भागकर दलाई लामा भारत आए थे। गुप्ता 1962 के भारत पर हुए चीनी हमले की पृष्ठभूमि में चार घटनाक्रम देखते हैं- अक्टूबर, 1950 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा तिब्बत कब्जा, ल्हासा का 1959 का विद्रोह, चौदहवें दलाई लामा को भारत में शरण और 1958 से 1961 के दौरान चीन में आया भीषण अकाल, जिसमें लाखों लोग मारे गए थे। युद्ध के लिए नेहरू की फॉरवर्ड पॉलिसी को भी जिम्मेदार ठहराया गया, जिसके तहत उन्होंने भारत-चीन सीमा पर चौकियों के निर्माण की इजाजत दी थी।
1962 के युद्ध ने नेहरू को व्यक्तिगत रूप से तो धक्का पहुंचाया ही, भारत-चीन के रिश्तों में भी ऐसी खटास आ गई कि उसे दूर करने में कई दशक लग गए। गुप्ता लिखते हैं कि 1976 में जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके चीनी समकक्ष ने दोनों देशों में अपने राजदूत नियुक्त करने पर सहमति जताई। दरअसल इसकी पृष्ठभूमि 1970 में उस वक्त बन गई थी, जब चेयरमैन माओ ने विदेशी दूतों के साथ मुलाकात के दौरान भारतीय राजनयिक ब्रजेश मिश्र से कहा कि भारत एक महान देश है और वहां के लोग भी महान हैं। हमें एक-दूसरे के प्रति दोस्ताना रुख रखना चाहिए न कि झगड़ते रहना चाहिए। इसके बाद फरवरी 1979 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के समाधान पर बात हुई। यह भी उल्लेखनीय है कि बाद में वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने और ब्रजेश मिश्र को उन्होंने अपना सुरक्षा सलाहकार बनाया था।
रिश्ते सुधरने के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा का मसला आज भी जटिल बना हुआ है। हालांकि चीन जम्मू-कश्मीर के मामले में निरापद रहने का दावा करता है, मगर हकीकत यह है कि वह भारत-चीन की सीमा सिर्फ 2000 किमी लंबी मानता है। जबकि, भारत के मुताबिक यह सीमा 3488 किमी लंबी है, जिसमें से 1500 किमी जम्मू-कश्मीर से लगी हुई है। दरअसल इसी 3488 किमी लंबी सीमा को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कहा जाता है। मगर हाल के समय में ऐसे कई मौके आए जब चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान एलएसी को पार कर भारत की सीमा में घुस आए। यही नहीं, एलएसी के नजदीक अपने वाले हिस्से में चीन ने बांध जैसे कई निर्माण भी कर लिए हैं, जिससे भारत में बाढ़ का खतरा बना रहता है।
सही बात तो यह है कि अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे पर चीन का रुख आज तक साफ नहीं है। यह महज संयोग नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव अभियान के दौरान इसी वर्ष 21 फरवरी को अरुणाचल प्रदेश में पहली बार विदेश नीति के मुद्दे पर बोलते हुए चीन पर तीखे हमले किए थे और कहा था कि चीन को अपनी विस्तारवादी नीति छोड़ देनी चाहिए और दोनों देशों की शांति, समृद्धि और प्रगति के लिए भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में भी दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी, जब लद्दाख में 16वीं सदी के एक व्यापारी के नाम पर 5,000 मीटर से भी अधिक ऊंचाई पर बनी भारतीय सेना की एक चौकी दौलत बेग ओल्डी में तैनात जवानों ने महज 600 मीटर की दूरी पर पीएलए के जवानों को देखा था।
पीएलए के जवान न केवल भारत की सीमा में घुस आए थे, बल्कि उन्होंने अस्थायी टेंट भी बना लिए थे। चीन ने पीएलए की इस हरकत को कमतर बताने की कोशिश की थी, मगर भारत के लिए यह चिंता का सबब है। गुप्ता उस वक्त विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन यात्रा का जिक्र करते हुए नरेंद्र मोदी के उस बयान की याद दिलाते हैं, जिसमें उन्होंने खुर्शीद से कहा था कि वह चीन में ही बस जाएं! गुप्ता की यह किताब लोकसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले बाजार में आ गई थी। अब मोदी प्रधानमंत्री बन चुके हैं और उनके पास भारत-चीन संबंधों को नई दिशा देने का मौका है। मगर उन्हें याद रखना होगा कि इतिहास में सब कुछ रफ ड्रॉफ्ट की तरह नहीं होता।
पुस्तक अंश:
1 अगस्त, 2000 को रात 1.30 बजे सतलुज में पानी का सैलाब आया और उसने हिमाचल प्रदेश के किन्नौर, शिमला और मंडी जिलों के पहाड़ी रास्तों में जो कुछ सामने आया सब कुछ बहा दिया। सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई। 120 किमी लंबा सामरिक महत्व का पुराना हिंदुस्तान-तिब्बत हाईवे बह गया। छोटे-बड़े 98 पुल नष्ट हो गए। कुल-मिलाकर 200 करोड़ रुपये की क्षति का अनुमान लगाया गया। अचानक आई यह बाढ़ दो माह पूर्व अरुणाचल में आई ऐसी ही बाढ़ का मानो रिप्ले थी। उस वक्त भारतीय हिस्से में तबाही मचाने वाली नदी का नाम स्थानीय बोली में सियांग था, जिसे चीन में त्सांगपो के नाम से जाना जाता है और पूरे भारत में ब्रह्मपुत्र के। उस दिन सियांग नदी अप्रत्याशित तरीके से 100 से 120 फीट ऊपर बह रही थी और उसने प्रदेश के चार जिलों में तबाही मचाई थी। 26 लोग मारे गए, सामरिक महत्व के कई पुल नष्ट हो गए और आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक 139 करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ। इन दोनों बाढ़ों को तत्कालीन एनडीए सरकार ने बादल फटने की प्राकृतिक घटना माना। वास्तव में यह रिपोर्ट कृषि मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग में कहीं धूल खाती पड़ी होती अगर भारतीय अंतरिक्ष संस्थान (इसरो) ने यह सनसनीखेज खुलासा न किया होता कि बाढ़ का कारण बेतहाशा छोड़ा गया पानी था, जो कि तिब्बत के इलाके में सतुलज और सियांग नदी के बांधों में रोककर रखा गया था....।